Wednesday, 1 February 2017

एलर्जी

" एलर्जी " एक आम शब्द , जिसका प्रयोग हम कभी ' किसी ख़ास व्यक्ति से मुझे एलर्जी है ' के रूप में करते हैं. ऐसे ही हमारा शरीर भी ख़ास रसायन उद्दीपकों के प्रति अपनी असहज प्रतिक्रया को ' एलर्जी ' के रूप में दर्शाता है.

बारिश के बाद आयी धूप तो ऐसे रोगियों क़ी स्थिति को और भी दूभर कर देती है. ऐसे लोगों को अक्सर अपने चेहरे पर रूमाल लगाए देखा जा सकता है. क्या करें छींक के मारे बुरा हाल जो हो जाता है.

हालांकि एलर्जी के कारणों को जानना कठिन होता है , परन्तु कुछ आयुर्वेदिक उपाय इसे दूर करने में कारगर हो सकते हैं. आप इन्हें अपनाएं और एलर्जी से निजात पाएं !

• नीम चढी गिलोय के डंठल को छोटे टुकड़ों में काटकर इसका रस हरिद्रा खंड चूर्ण के साथ 1.5 से तीन ग्राम नियमित प्रयोग पुरानी से पुरानी एलर्जी में रामबाण औषधि है.

• गुनगुने निम्बू पानी का प्रातःकाल नियमित प्रयोग शरीर सें विटामिन - सी की मात्रा की पूर्ति कर एलर्जी के कारण होने वाले नजला - जुखाम जैसे लक्षणों को दूर करता है.

• अदरख , काली मिर्च , तुलसी के चार पत्ते , लौंग एवं मिश्री को मिलाकर बनायी गयी ' हर्बल चाय ' एलर्जी से निजात दिलाती है.

•  बरसात के मौसम में होनेवाले विषाणु ( वायरस ) संक्रमण के कारण ' फ्लू ' जनित लक्षणों को नियमित ताजे चार नीम के पत्तों को चबा कर दूर किया जा सकता है.

• आयुर्वेदिक दवाई ' सितोपलादि चूर्ण ' एलर्जी के रोगियों में चमत्कारिक प्रभाव दर्शाती है.

•  नमक पानी से ' कुंजल क्रिया ' एवं ' नेती क्रिया " कफ दोष को बाहर निकालकर पुराने से पुराने एलर्जी को दूर कने में मददगार होती है.

•  पंचकर्म की प्रक्रिया ' नस्य ' का चिकित्सक के परामर्श से प्रयोग ' एलर्जी ' से बचाव ही नहीं इसकी सफल चिकित्सा है.

•  प्राणायाम में ' कपालभाती ' का नियमित प्रयोग एलर्जी से मुक्ति का सरल उपाय है.

कुछ सावधानियां जिन्हें अपनाकर आप एलर्जी से खुद को दूर रख सकते हैं : -

•  धूल , धुआं एवं फूलों के परागकण आदि के संपर्क से बचाव.

•  अत्यधिक ठंडी एवं गर्म चीजों के सेवन से बचना.

•  कुछ आधुनिक दवाओं जैसे : एस्पिरीन , निमासूलाइड आदि का सेवन सावधानी से करना.

•  खटाई एवं अचार के नियमित सेवन से बचना.

हल्दी से बनी आयुर्वेदिक औषधि '

  हरिद्रा खंड ' के सेवन से शीतपित्त , खुजली , एलर्जी , और चर्म रोग नष्ट होकर देह में सुन्दरता आ जाती हे | बाज़ार में यह ओषधि सूखे चूर्ण के रूप में मिलती हे | इसे खाने के लिए मीठे दूध का प्रयोग अच्छा होता हे | परन्तु शास्त्र विधि में इसको निम्न प्रकार से घर पर बना कर खाया जाये तो अधिक गुणकारी रहता हे | बाज़ार में इस विधि से बना कर चूँकि अधिक दिन तक नहीं रखा जा सकता , इसलिए नहीं मिलता हे | घर पर बनी इस विधि बना हरिद्रा खंड अधिक गुणकारी और स्वादिष्ट होता हे | मेरा अनुभव हे की कई सालो से चलती आ रही एलर्जी , या स्किन में अचानक उठाने वाले चकत्ते , खुजली इसके दो तीन माह के सेवन से हमेशा के लिए ठीक हो जाती हे | इस प्रकार के रोगियों को यह बनवा कर जरुर खाना चाहिए | और अपने मित्रो कोभी बताना चाहिए | यह हानि रहित निरापद बच्चे बूढ़े सभी को खा सकने योग्य हे | जो नहीं बना सकते वे या शुगर के मरीज , कुछ कम गुणकारी , चूर्ण रूप में जो की बाज़ार में उपलब्ध हे का सेवन कर सकते हे |

हरिद्रा खंड निर्माण विधि

सामग्री -

 हरिद्रा -320 ग्राम , गाय का घी - 240 ग्राम , दूध - 5 किलो , शक्कर -2 किलो |
    सोंठ , कालीमिर्च , पीपल , तेजपत्र , छोटी इलायची , दालचीनी , वायविडंग , निशोथ , हरड , बहेड़ा , आंवले , नागकेशर , नागरमोथा , और लोह भस्म , प्रत्येक 40-40 ग्राम ( यह सभी आयुर्वेदिक औषधि विक्रेताओ से मिल जाएँगी ) | आप यदि अधिक नहीं बनाना चाहते तो हर वस्तु अनुपात रूप से कम की जा सकती हे |

( यदि हल्दी ताजी मिल सके तो 1 किलो 250 ग्राम लेकर छीलकर मिक्सर पीस कर काम में लें | )

बनाने की विधि - हल्दी को दूध में मिलाकार खोया या मावा बनाये , इस खोये को घी डालकर धीमी आंच पर भूने , भुनने के बाद इसमें शक्कर मिलाये | सक्कर गलने पर शेष औषधियों का कपड छान बारीक़ चूर्ण मिला देवे | अच्छी तरह से पाक जाने पर चक्की या लड्डू बना लें |
सेवन की मात्रा - 20-25 ग्राम दो बार दूध के साथ |
( बाज़ार में मिलने वाला हरिद्रखंड चूर्ण के रूप में मिलता हे इसमें घी और दूध नहीं होता शकर कम या नहीं होती अत : खाने की मात्रा भी कम 3 से 5 ग्राम दो बार रहेगी | )

खेचरी मुद्रा

खेचरी मुद्रा को योग को धारण करने वाली मुद्रा कहा गया है। मेरे मत के अनुसार इस मुद्रा के बिना योग की उच्च अवस्था को पाना असम्भव हैं। जिह्वा को बढ़ा कर या लम्बा करके मुख के अन्दर पीछे एक रन्द्र(सुराख) नीचे जाता हैं व एक रन्द्र ऊपर को जाता हैं जिसे कपाल कुहार कहते हैं। कपाल कुहार मे जिह्वा को प्रवेश करवाया जाता हैं। कपाल कुहार मे जब साधक की जिह्वा कुछ समय के लिए रूकने लग जाती है व जिह्वा को अन्दर रोककर साधक जब साधना करने लगता है तो प्राय उसे खेचरीवान मान लिया जाता है। मेरे अनुसार जिह्वा को मात्र अन्दर ले जाना पर्याप्त नहीं है, जिह्वा के अन्दर जाने मात्र से साधक को कोई विशेष लाभ नही मिलता। वास्तव में खेचरीवान वह साधक हैं जिसने जिह्वा को बढा कर कपाल गुहार में ले जा कर सुषुम्णा के माध्यम से प्राण वायु के नीचे जाने वाले मार्ग को बन्द कर देता है या बन्द कर दिया है या जो साधक जिह्वा के द्वारा आज्ञा चक्र से नीचे के चक्रो की तरफ जाने वाली प्राण वायु को रोक दिया हैं। वह साधक वास्तव में खेचरी वान हैं। जब तक प्राण वायु का प्रवाह नीचे की तरफ रहता हैं तब तक वास्तविक साधना नही होती। जब खेचरी मुद्रा के द्वारा प्राण वायु का प्रवाह ऊपर की तरफ होता हैं तभी वास्तविक साधना आरम्भ होती है। अब प्राण वायु के नीचे व ऊपर जाने के मार्ग पर चर्चा करते हैं।

साधारणतया सभी मनुष्य नासिका से श्वास लेते हैं। श्वास नासापुटों से होता हुआ गले के मार्ग द्वारा फेफडों मे चला जाता है। श्वास लेने की दो विधियाँ हैं। पहली साधारण विधि जिस विधि से प्रायः सभी श्वास लेते हैं। दूसरी योगिक विधि जिसे योग की भाषा में क्रिया कुण्डलिनी प्राणायाम कहते हैं। इस प्राणायाम की विधि से श्वास लिया जाता हैं। लेते तो इसे भी नासिका के द्वारा है परन्तु इसे गले की सहायता से बलपूर्वक खीचा जाता है। इस प्राणायाम को यदि आप सीखना चाहे तो किसी क्रिया योग के जानकार से या योगदा सत्संग सोसायटी के किसी भी आचार्य सें या जो भी ऐसा आचार्य जो क्रिया कुण्डलिनी प्राणायाम का जानकर हो उससे सीख सकते हैं। आप स्ंवय भी (जब तक कोई जानकार न मिले) लेने का प्रयास कर सकते हैं। श्वास खींचते हुए आरम्भ मे खर्राटे जैसे ध्वनि आ सकती है यदि ऐसी ध्वनि आये तो समझना ठीेक हैं।

जब साधक क्रिया कुण्डलिनी प्राणायाम खीचते है तो प्राण वायु सीधे फेफड़ो मे न जाकर सुषुम्णा नाड़ी मे प्रवेश करती हैं व आज्ञा चक्र से नीचे के चक्रो की तरफ जाती है व मूलाधार तक जाती है। यह क्रिया साधक को मजबूरन तब तक करनी पड़ती हैं जब तक साधक की खेचरी पूर्ण नही हो जाती। जब तक प्राण वायु नीचे की तरफ चलती रहती है तब तक साधना मे कोई विशेष उन्नति नहीं होती। साधना मे उन्नति तभी होती है जब साधक जिह्वा के द्वारा प्राणवायु को नीचे जाने से रोकता है व प्राण वायु को ऊपर की तरफ ले जाता है। निरन्तर अभ्यास से व सद्गुरू महावतार श्री हरि कि कृपा से व साधक के दृढ़ संकल्प से एक न एक दिन अवश्य ही दशम द्वार खुल जायेगा। दशम द्वार खुलने से ही साधना में वास्तविक आन्नद की अनुभूति होती हैं।

संजीवनी भोजन – चार चम्मच और एक चम्मच मेथी दाना


आज हम आपको ऐसे भोजन के बारे में बताने जा रहें है, जिसको अगर संजीवनी भी कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा. बल बुद्धि और वीर्य बढाने में ये रामबाण है. इसके सेवन से आप खांसी जुकाम से लेकर कैंसर तक आप हर बीमारी से बच सकते हैं. ये भोजन स्वस्थ व्यक्ति को निरोगी बनाये रखता है, कमजोरों को शक्तिशाली, बच्चों को चैंपियन, बूढों को जवान, और जवानो को 100 वर्ष तक जवान बना कर रखता है. इसके फायदे अनगिनत हैं. आइये जाने चार चम्मच गेंहू के दाने और एक चम्मच मेथी दाना से बना ये संजीवनी भोजन.

चार चम्मच गेंहू के दाने और एक चम्मच मेथी दाना ले कर दोनों को चार पांच बार अच्छी तरह साफ़ जल से धो लीजिये. इस के बाद आधा गिलास पानी में डालकर चौबीस घंटे रखें. फिर इनको पानी से निकालकर एक मोटे गीले कपडे में बांधकर अंकुरित होने के लिए चौबीस घंटे तक हवा में लटका दीजये. गर्मियों में बीच बीच में पानी के छींटे मारते रहें.

जिस पानी में गेंहू के दाने और मेथी दानो को भिगोया था उस पानी में आधा निम्बू निचोड़ कर दो ग्राम सौंठ का चूर्ण डाल दीजिये. इसमें दो चम्मच शहद घोलकर सुबह खाली पेट लें. यह पेय बहुत शक्तिवर्धक, पाचक, और सफुर्तिदायक होता है. इसको संजीवनी पेय कहते हैं.

अभी जो गेंहू के दाने और मेथी के दाने अंकुरण के लिए लटकाए थे, जब उनमे अंकुर फूट जाए (औसतन गर्मियों में चौबीस या अड़तालीस घंटों में अंकुरित हो जाते हैं.) इनको सुबह नाश्ते में पीसी काली मिर्च और सेंधा नमक बुरककर खूब चबा चबा कर खाएं. इस नाश्ते को संजीवनी नाश्ता कहते हैं. जो व्यक्ति अंकुरित अन्न को चबा ना सके वो इसको ग्राइंड कर के इसका लाभ लें. अन्यथा उनको ऊपर पानी तक ही सीमित रहना पड़ेगा.

इस संजीवनी पेय और नाश्ते के फायदे.
जिन लोगों में खून की कमी है, ब्लड शुगर है (डायबिटीज), कफ़ की अधिक समस्या है, अस्थमा का प्रकोप है, शरीर कमज़ोर है, मोटापा अधिक है, कमजोरी रहती है, पूरा दिन आलस रहता है, खून में धक्के जमे हुए है, कमज़ोर दृष्टि है, नपुंसकता है, शीघ्रपतन की समस्या है, कैंसर, हृदय रोगों, लीवर के रोगों, किडनी के रोगों के लिए, स्त्रियों के श्वेत प्रदर और रक्त प्रदर में, बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए, खिलाडियों के लिए ऊर्जावान, यौवन को बरक़रार रखने वाला, चेहरे को कश्मीरी सेब जैसा खिला रखने वाला, 100 वर्ष तक भी निरोगी रखने वाला चमत्कारिक भोजन है. इसको हर आयु का व्यक्ति खा कर रक्त में जवानी का अहसास कर सकता है. कुल मिला कर इसको सर्व रोगों के लिए एक दवा कहा जा सकता है.

अंकुरण के लिए विशेष.
अंकुरण के लिए बढ़िया से बढ़िया अनाज का उपयोग करना चाहिए, और गर्मियों में जहाँ अंकुरण एक दो दिन में हो जाता है, वहीँ सर्दियों में यह 3 से 4 दिन ले सकता है. इसलिए धैर्य रखें. और हर रोज़ आप ये नाश्ता कर सकें. इस लिए जब तक अंकुरण फूटे नहीं, तब तक हर रोज़ नया गेंहू और मेथीदाना अंकुरित करते रहें. इस से तीन चार दिनों के बाद आपको निरंतर अंकुरित नाश्ता मिलना शुरू हो जायेगा..

आप सब भाई बहनों से अनुरोध है के आप जो भी प्रयोग करें उसके रिजल्ट हमसे ज़रूर शेयर करें. इस से अनेक लोगों को वो प्रयोग करने का साहस मिलेगा और आपको पुण्य मिलेगा.