- . आम की गुठली को पानी के साथ घिसें और कुत्ते के काटे वाली जगहपर लगाएं। एैसा करने से विष नष्ट हो जाता है।
- . पिसी हुई लाल मिर्च को तुरंत हीकुत्ते के काटे वाले जगह पर लेप लगाने से कुत्ते का विष नहीं लगताहै।
- . एलोवेरा को एक ओर से छिलकर उसकेगूदे पर सेंधा नमक डालकर कुत्ते के काटे वाली जगह पर लगाकर किसी सूती कपड़े से उसे बांध लें और एैसा 2 से 3 दिनों तक लगातार करें। यह कुत्ते के विष का खत्म कर देता है।
- . प्याज का रस, अखरोट की गिरी को बराबर मात्रा में पिस कर उसमें नमक मिला लें और फिर इसे शहद में मिलाकर कुत्ते के काटे स्थान पर लेप करके पट्टी कर लें। एैसा करनेसे शरीर पर कुत्ते के विष का प्रभाव नहीं पड़ता।
- . शहद के साथ पीसी हुई प्याज को मिलाकर कुत्ते के द्वारा काटी हुई जगह पर लगाने से विष का प्रभाव खत्म हो जाता है।भी लाभ मिलता है।
- . चैलाई की जड़ 50 से 100 ग्राम पानी में पीसकर घोलकर बार-बार रोगी को पिलाने से कुत्ते का विष खत्म हो जाता है।
- . कुत्ते के काटे स्थान को साबुन से धोकर डिटोल लगाकर पट्टी बांधने से विष का प्रभाव नहीं पड़ता है।
- . 15 काली मिर्च और 2 चम्मच जीरा को पानी में डालकर इसे पीसकर कुत्ते के काटे वाले स्थान पर लगाते रहने से कुछ दिनों में विष खत्म हो जाता है।
- . गेहूं के आटे की कच्ची रोटी कोकटे स्थान पर बांधकर कुछ देर बाद उसे उसी कुत्ते को खाने को दें जिसने काटा है। यदि वह कुत्ता रोटी खा ले तो समझें कि कुत्ता पागल नहीं है। और न खाए तो समझें वह पागल था
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Monday, 27 March 2017
कुत्ते के काटने का उपचार
Sunday, 19 March 2017
गर्भाशय में सूजन (Uterus Swelling) कारण लक्षण उपचार
अक्सर महिलाओं की गर्भाशय में सूजन (Uterus Swelling) आ जाती है. बदलते वातावरण या मौसम का प्रभाव गर्भाशय को अत्यधिक प्रभावित करता है.
आज हम आपको इस समस्या के मुख्य कारणों, इसके क्या लक्षण है. तथा इस बिमारी के उपचारों के बारे में बता रहे है. तो चलिए जानते है इनके बारे में.
गर्भाशय (Uterus Swelling) में सूजन के लक्षण
जिससे प्रभावित होने पे महिलाओं को बहुत कष्ट उठाना पड़ता है. इसके प्रभाव से भूंख नही लगती है. सिर दर्द, हल्का बुखार तथा कमर दर्द रहता है. पेट दर्द की समस्या भी रहती है.
गर्भाशय में सूजन (Uterus Swelling) के कारण
1. पेट की मांसपेशियों में अधिक कमजोरी आ जाने के कारण तथा व्यायाम न करने के कारण या फिर अधिक सख्त व्यायाम करने के कारण भी गर्भाशय में सूजन हो सकती है.
2. पेट में गैस तथा कब्ज बनने के कारण गर्भाशय में सूजन हो जाती है-
3. औषधियों का अधिक सेवन करने के कारण भी गर्भाशय में सूजन हो सकती है.
4. जरुरत से जादा अधिक सहवास करने के कारण भी गर्भाशय में सूजन हो सकती है.
5. भूख से अधिक भोजन सेवन करने के कारण स्त्री के गर्भाशय में सूजन आ जाती है तथा अधिक तंग कपड़े पहनने के कारण भी गर्भाशय में सूजन हो सकती है-प्रसव के दौरान सावधानी न बरतने के कारण भी गर्भाशय में सूजन हो सकती है.
गर्भाशय में सूजन (Uterus Swelling) का उपचार
1. गर्भाशय में सूजन से पीड़ित महिला को चटपटे मसालों-मिर्च-तली हुई चीजें और मिठाई से परहेज रखना चाहिए.
2. पीड़ित स्त्री को दो तीन बार अपने पैर कम से कम एक घंटे के लिए एक फुट ऊपर उठाकर लेटना चाहिए और आराम करना चाहिए.
3. गर्भाशय में सूजन हो जाने पर महिला रोगी को चार-पांच दिनों तक फलों का जूस पीकर उपवास करना चाहिए- उसके बाद बिना पका हुआ संतुलित आहार लेना चाहिए.
4. निर्गुण्डी को किसी भी प्रकार के बाहरी भीतरी सूजन के लिए इसका उपयोग किया जाता है यह औषधि वेदना शामक और मज्जा तंतुओं को शक्ति देने वाली है वैसे आयुर्वेद में सुजन उतारने वाली और भी कई औषधियों का वर्णन आता है पर निर्गुण्डी इन सब में अग्रणी है और सर्वसुलभ भी-नीम,(निर्गुन्डी) सम्भालु के पत्ते और सोंठ सभी का काढ़ा बनाकर जननांग में लगाने से सुजन ख़त्म हो जाती है.
5. बादाम रोगन एक चम्मच, शरबत बनफ्सा तीन चम्मच और खांड पानी में मिलाकर सुबह पीयें तथा बादाम रोगन का एक रुई का फोया जननांग के मुह पर रखें-इससे गर्मी के कारण गर्भाशय में सूजन ठीक हो जाती है.
6. अरंड के पत्तों का रस छानकर रुई में भिगोकर जननांग में लगाने से भी सूजन ख़त्म हो जाती है.
7. अशोक की छाल 120 ग्राम, वरजटा, काली सारिवा, लाल चन्दन, दारूहल्दी, मंजीठ प्रत्येक को 100-100 ग्राम मात्रा, छोटी इलायची के दाने और चन्द्रपुटी प्रवाल भस्म 50-50 ग्राम, सहस्त्रपुटी अभ्रक भस्म 40 ग्राम, वंग भस्म और लौह भस्म 30-30 ग्राम तथा मकरध्वज गंधक जारित 10 ग्राम की मात्रा में लेकर सभी औषधियों को कूटछानकर चूर्ण तैयार कर लेते हैं फिर इसमें क्रमश: खिरेंटी, सेमल की छाल तथा गूलर की छाल के काढ़े में 3-3 दिन खरल करके 1-1 ग्राम की गोलियां बनाकर छाया में सुखा लेते हैं फिर इसे एक या दो गोली की मात्रा में मिश्रीयुक्त गाय के दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करना चाहिए-इसे लगभग एक महीने तक सेवन कराने से स्त्रियों के अनेक रोगों में लाभ मिलता है-इससे गर्भाशय में सूजन जलन, रक्तप्रदर, माहवारी के विभिन्न विकार या प्रसव के बाद होने वाली दुर्बलता इससे नष्ट हो जाती है.
8. एरण्ड(अंडी) के पत्तों का रस छानकर रूई भिगोकर गर्भाशय के मुंह पर तीन-चार दिनों तक रखने से गर्भाशय में सूजन मिट जाती है.
9. कासनी की जड़, गुलबनफ्सा और वरियादी 6-6 ग्राम की मात्रा में, गावजवां और तुख्म कसुम 5-5 ग्राम, तथा मुनक्का 6 या 7 को एक साथ बारीक पीसकर उन्हें 250 ग्राम पानी के साथ सुबह-शाम को छानकर पिला देते हैं यह उपयोग नियमित रूप से आठ-दस दिनों तक करना चाहिए-इससे गर्भाशय में सूजन रक्तस्राव, बलगम, पीव आदि में पर्याप्त लाभ मिलता है.
10. चिरायते के काढ़े से योनि को धोएं और चिरायता को पानी में पीसकर पेडू़ और योनि पर इसका लेप करें इससे सर्दी की वजह से होने वाली गर्भाशय की सूजन नष्ट हो जाती है
Tuesday, 1 November 2016
विभिन्न रोगों में अदरक से उपचार:
70 रोगो की दवा अदरक
1 हिचकी :- *सभी प्रकार की हिचकियों में अदरक की साफ की हुई छोटी डली चूसनी चाहिए।
*अदरक के बारीक टुकड़े को चूसने से हिचकी जल्द बंद हो जाती है। घी या पानी में सेंधानमक पीसकर मिलाकर सूंघने से हिचकी बंद हो जाती है।
*एक चम्मच अदरक का रस लेकर गाय के 250 मिलीलीटर ताजे दूध में मिलाकर पीने से हिचकी में फायदा होता है।
*एक कप दूध को उबालकर उसमें आधा चम्मच सोंठ का चूर्ण डाल दें और ठंडा करके पिलाएं।
*ताजे अदरक के छोटे-छोटे टुकड़े करके चूसने से पुरानी एवं नई तथा लगातार उठने वाली हिचकियां बंद हो जाती हैं। समस्त प्रकार की असाध्य हिचकियां दूर करने का यह एक प्राकृतिक उपाय है।"
2 पेट दर्द :- *अदरक और लहसुन को बराबर की मात्रा में पीसकर एक चम्मच की मात्रा में पानी से सेवन कराएं।
*पिसी हुई सोंठ एक ग्राम और जरा-सी हींग और सेंधानमक की फंकी गर्म पानी से लेने से पेट दर्द ठीक हो जाता है। एक चम्मच पिसी हुई सोंठ और सेंधानमक एक गिलास पानी में गर्म करके पीने से पेट दर्द, कब्ज, अपच ठीक हो जाते हैं।
*अदरक और पुदीना का रस आधा-आधा तोला लेकर उसमें एक ग्राम सेंधानमक डालकर पीने से पेट दर्द में तुरन्त लाभ होता है।
*अदरक का रस और तुलसी के पत्ते का रस 2-2 चम्मच थोड़े से गर्म पानी के साथ पिलाने से पेट का दर्द शांत हो जाता है।
*एक कप गर्म पानी में थोड़ा अजवायन डालकर 2 चम्मच अदरक का रस डालकर पीने से लाभ होता है।
*अदरक के रस में नींबू का रस मिलाकर उस पर कालीमिर्च का पिसा हुआ चूर्ण डालकर चाटने से पेट के दर्द में आराम मिलता है।
*अदरक का रस 5 मिलीलीटर, नींबू का रस 5 मिलीलीटर, कालीमिर्च का चूर्ण 1 ग्राम को मिलाकर पीने से पेट का दर्द समाप्त होता है।"
3 मुंह की दुर्गध :- एक चम्मच अदरक का रस एक गिलास गर्म पानी में मिलाकर कुल्ला करने से मुख की दुर्गन्ध दूर हो जाती है।
4 दांत का दर्द:- *महीन पिसा हुआ सेंधानमक अदरक के रस में मिलाकर दर्द वाले दांत पर लगाएं।
*दांतों में अचानक दर्द होने पर अदरक के छोट-छोटे टुकड़े को छीलकर दर्द वाले दांत के नीचे दबाकर रखें।
*सर्दी की वजह से दांत के दर्द में अदरक के टुकड़ों को दांतों के बीच दबाने से लाभ होता है। "
5 भूख की कमी:- अदरक के छोटे-छोटे टुकड़ों को नींबू के रस में भिगोकर इसमें सेंधानमक मिला लें, इसे भोजन करने से पहले नियमित रूप से खिलाएं।
6 सर्दी-जुकाम:- पानी में गुड़, अदरक, नींबू का रस, अजवाइन, हल्दी को बराबर की मात्रा में डालकर उबालें और फिर इसे छानकर पिलाएं।
7 गला खराब होना:- अदरक, लौंग, हींग और नमक को मिलाकर पीस लें और इसकी छोटी-छोटी गोलियां तैयार करें। दिन में 3-4 बार एक-एक गोली चूसें।
8 पक्षाघात (लकवा):- *घी में उड़द की दाल भूनकर, इसकी आधी मात्रा में गुड़ और सोंठ मिलाकर पीस लें। इसे दो चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार खिलाएं।
*उड़द की दाल पीसकर घी में सेकें फिर उसमें गुड़ और सौंठ पीसकर मिलाकर लड्डू बनाकर रख लें। एक लड्डू प्रतिदिन खाएं या सोंठ और उड़द उबालकर इनका पानी पीयें। इससे भी लकवा ठीक हो जाता है।"
9 पेट और सीने की जलन :- एक गिलास गन्ने के रस में दो चम्मच अदरक का रस और एक चम्मच पुदीने का रस मिलाकर पिलाएं।
10 वात और कमर के दर्द:- अदरक का रस नारियल के तेल में मिलाकर मालिश करें और सोंठ को देशी घी में मिलाकर खिलाएं।
11 पसली का दर्द :- 30 ग्राम सोंठ को आधा किलो पानी में उबालकर और छानकर 4 बार पीने से पसली का दर्द खत्म हो जाता है।
12 चोट लगना, कुचल जाना:- चोट लगने, भारी चीज उठाने या कुचल जाने से
पीड़ित स्थान पर अदरक को पीसकर गर्म करके आधा इंच मोटा लेप करके पट्टी बॉंध दें। दो घण्टे के बाद पट्टी हटाकर ऊपर सरसो का तेल लगाकर सेंक करें। यह प्रयोग प्रतिदिन एक बार करने से दर्द शीघ्र ही दूर हो जाता है।
13 संग्रहणी (खूनी दस्त) :- सोंठ, नागरमोथा, अतीस, गिलोय, इन्हें समभाग लेकर पानी के साथ काढ़ा बनाए। इस काढे़ को सुबह-शाम पीने से राहत मिलती है।
14 ग्रहणी (दस्त) :- गिलोय, अतीस, सोंठ नागरमोथा का काढ़ा बनाकर 20 से 25 मिलीलीटर दिन में दो बार दें।
15 भूखवर्द्धक :- *दो ग्राम सोंठ का चूर्ण घी के साथ अथवा केवल सोंठ का चूर्ण गर्म पानी के साथ प्रतिदिन सुबह-सुबह खाने से भूख बढ़ती है।
*प्रतिदिन भोजन से पहले नमक और अदरक की चटनी खाने से जीभ और गले की शुद्धि होती है तथा भूख बढ़ती है।
*अदरक का अचार खाने से भूख बढ़ती है।
*सोंठ और पित्तपापड़ा का पाक (काढ़ा) बुखार में राहत देने वाला और भूख बढ़ाने वाला है। इसे पांच से दस ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सेवन करें।
*सोंठ, चिरायता, नागरमोथा, गिलोय का काढ़ा बनाकर सेवन करने से भूख बढ़ती है और बुखार में भी लाभदायक है।"
16 अजीर्ण :- *यदि प्रात:काल अजीर्ण (रात्रि का भोजन न पचने) की शंका हो तो हरड़, सोंठ तथा सेंधानमक का चूर्ण जल के साथ लें। दोपहर या शाम को थोड़ा भोजन करें।
*अजवायन, सेंधानमक, हरड़, सोंठ इनके चूर्णों को एक समान मात्रा में एकत्रित करें। एक-एक चम्मच प्रतिदिन सेवन करें।
*अदरक के 10-20 मिलीलीटर रस में समभाग नींबू का रस मिलाकर पिलाने से मंदाग्नि दूर होती है।"
17 उदर (पेट के) रोग :- सोंठ, हरीतकी, बहेड़ा, आंवला इनको समभाग लेकर कल्क बना लें। गाय का घी तथा तिल का तेल ढाई किलोग्राम, दही का पानी ढाई किलोग्राम, इन सबको मिलाकर विधिपूर्वक घी का पाक करें, तैयार हो जाने पर छानकर रख लें। इस घी का सेवन 10 से 20 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम करने से सभी प्रकार के पेट के रोगों का नाश होता है।
18 बहुमूत्र :- अरदक के दो चम्मच रस में मिश्री मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से लाभ होता है।
19 बवासीर के कारण होने वाला दर्द :- दुर्लभा और पाठा, बेल का गूदा और पाठा, अजवाइन व पाठा अथवा सौंठ और पाठा इनमें से किसी एक योग का सेवन करने से बवासीर के कारण होने वाले दर्द में राहत मिलती है।
20 मूत्रकृच्छ (पेशाब करते समय परेशानी) :- *सोंठ, कटेली की जड़, बला मूल, गोखरू इन सबको दो-दो ग्राम मात्रा तथा 10 ग्राम गुड़ को 250 मिलीलीटर दूध में उबालकर सुबह-शाम पीने से मल-मूत्र के समय होने वाला दर्द ठीक होता है।
*सोंठ पीसकर छानकर दूध में मिश्री मिलाकर पिलाएं।"
21 अंडकोषवृद्धि :- इसके 10-20 मिलीलीटर रस में दो चम्मच शहद मिलाकर पीने से वातज अंडकोष की वृद्धि मिटती है।
22 कामला (पीलिया) :- अदरक, त्रिफला और गुड़ के मिश्रण का सेवन करने से लाभ होता है।
23 अतिसार (दस्त):- *सोंठ, खस, बेल की गिरी, मोथा, धनिया, मोचरस तथा नेत्रबाला का काढ़ा दस्तनाशक तथा पित्त-कफ ज्वर नाशक है।
*धनिया 10 ग्राम, सोंठ 10 ग्राम इनका विधिवत काढ़ा बनाकर रोगी को सुबह-शाम सेवन कराने से दस्त में काफी राहत मिलती है।"
24 वातरक्त :- अंशुमती के काढ़ा में 640 मिलीलीटर दूध को पकाकर उसमें 80 ग्राम मिश्री मिलाकर पीने के लिए दें। उसी प्रकार पिप्पली और सौंठ का काढ़ा तैयार करके 20 मिलीलीटर प्रात:-शाम वातरक्त के रोगी को पीने के लिए दें।
25 वातशूल :- सोंठ तथा एरंड के जड़ के काढे़ में हींग और सौवर्चल नमक मिलाकर पीने से वात शूल नष्ट होता है।
26 सूजन :- *सोंठ, पिप्पली, जमालगोटा की जड़, चित्रकमूल, बायविडिंग इन सभी को समान भाग लें और दूनी मात्रा में हरीतकी चूर्ण लेकर इस चूर्ण का सेवन तीन से छ: ग्राम की मात्रा में गर्म पानी के साथ सुबह करें।
*सोंठ, पिप्पली, पान, गजपिप्पली, छोटी कटेरी, चित्रकमूल, पिप्पलामूल, हल्दी, जीरा, मोथा इन सभी द्रव्यों को समभाग लेकर इनके कपडे़ से छानकर चूर्ण को मिलाकर रख लें, इस चूर्ण को दो ग्राम की मात्रा में गुनगुने पानी के साथ दिन में तीन बार सेवन करने से त्रिदोष के कारण उत्पन्न सूजन तथा पुरानी सूजन नष्ट होती है।
*अदरक के 10 से 20 मिलीलीटर रस में गुड़ मिलाकर सुबह-सुबह पी लें। इससे सभी प्रकार की सूजन जल्दी ही खत्म हो जाती है।"
27 शूल (दर्द) :- सोंठ के काढ़े के साथ कालानमक, हींग तथा सोंठ के मिश्रित चूर्ण का सेवन करने से कफवातज हृदयशूल, पीठ का दर्द, कमर का दर्द, जलोदर, तथा विसूचिका आदि रोग नष्ट होते हैं। यदि मल बंद होता है तो इसके चूर्ण को जौ के साथ पीना चाहिए।
28 संधिपीड़ा (जोड़ों का दर्द) :- *अदरक के एक किलोग्राम रस में 500 मिलीलीटर तिल का तेल डालकर आग पर पकाना चाहिए, जब रस जलकर तेल मात्र रह जाये, तब उतारकर छान लेना चाहिए। इस तेल की शरीर पर मालिश करने से जोड़ों की पीड़ा मिटती है।
*अदरक के रस को गुनगुना गर्म करके इससे मालिश करें।"
29 बुखार में बार-बार प्यास लगना :- सोंठ, पित्तपापड़ा, नागरमोथा, खस लाल चंदन, सुगन्ध बेला इन सबको समभाग लेकर बनाये गये काढ़े को थोड़ा-थोड़ा पीने से बुखार तथा प्यास शांत होती है। यह उस रोगी को देना चाहिए जिसे बुखार में बार-बार प्यास लगती है।
30 कुष्ठ (कोढ़) :- सोंठ, मदार की पत्ती, अडूसा की पत्ती, निशोथ, बड़ी इलायची, कुन्दरू इन सबका समान-समान मात्रा में बने चूर्ण को पलाश के क्षार और गोमूत्र में घोलकर बने लेप को लगाकर धूप में तब तक बैठे जब तक वह सूख न जाए, इससे मण्डल कुष्ठ फूट जाता है और उसके घाव शीघ्र ही भर जाते हैं।
31 बुखार में जलन :- सोंठ, गन्धबाला, पित्तपापड़ा खस, मोथा, लाल चंदन इनका काढ़ा ठंडा करके सेवन करने से प्यास के साथ उल्टी, पित्तज्वर तथा जलन आदि ठीक हो जाती है।
32 हैजा :- अदरक का 10 ग्राम, आक की जड़ 10 ग्राम, इन दोनों को खरल (कूटकर) इसकी कालीमिर्च के बराबर गोली बना लें। इन गोलियों को गुनगुने पानी के साथ देने से हैजे में लाभ पहुंचता है इसी प्रकार अदरक का रस व तुलसी का रस समान भाग लेकर उसमें थोड़ी सी शहद अथवा थोड़ी सा मोर के पंख की भस्म मिलाने से भी हैजे में लाभ पहुंचता है।
33 इन्फ्लुएंजा :- 6 मिलीलीटर अदरक रस में, 6 ग्राम शहद मिलाकर दिन में तीन-चार बार सेवन करें।
34 सन्निपात ज्वर :- *त्रिकुटा, सेंधानमक और अदरक का रस मिलाकर कुछ दिनों तक सुबह-शाम चटायें।
*सन्निपात की दशा में जब शरीर ठंडा पड़ जाए तो इसके रस में थोड़ा लहसुन का रस मिलाकर मालिश करने से गरमाई आ जाती है।"
35 गठिया :- 10 ग्राम सोंठ 100 मिलीलीटर पानी में उबालकर ठंडा होने पर शहद या शक्कर मिलाकर सेवन करने से गठिया रोग दूर हो जाता है।
36 वात दर्द, कमर दर्द तथा जांघ और गृध्रसी दर्द :- एक चम्मच अदरक के रस में आधा चम्मच घी मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है।
37 मासिक-धर्म का दर्द से होना (कष्टर्त्तव) :- इस कष्ट में सोंठ और पुराने गुड़ का काढ़ा बनाकर पीना लाभकारी है। ठंडे पानी और खट्टी चीजों से परहेज रखें।
38 प्रदर :- 10 ग्राम सोंठ 250 मिलीलीटर पानी में डालकर उबालें और शीशी में छानकर रख लें। इसे 3 सप्ताह तक पीएं।
39 हाथ-पैर सुन्न हो जाना :- सोंठ और लहसुन की एक-एक गांठ में पानी डालकर पीस लें तथा प्रभावित अंग पर इसका लेप करें। सुबह खाली पेट जरा-सी सोंठ और लहसुन की दो कली प्रतिदिन 10 दिनों तक चबाएं।
40 मसूढ़े फूलना (मसूढ़ों की सूजन) :- *मसूढ़े फूल जाएं तो तीन ग्राम सोंठ को दिन में एक बार पानी के साथ फांकें। इससे दांत का दर्द ठीक हो जाता है। यदि दांत में दर्द सर्दी से हो तो अदरक पर नमक डालकर पीड़ित दांतों के नीचे रखें।
*मसूढ़ों के फूल जाने पर 3 ग्राम सूखा अदरक दिन में 1 बार गर्म पानी के साथ खायें। इससे रोग में लाभ होता है।
*अदरक के रस में नमक मिलाकर रोजाना सुबह-शाम मलने से सूजन ठीक होती है।"
41 गला बैठना, श्वांस-खांसी और जुकाम :- अदरक का रस और शहद 30-30 ग्राम हल्का गर्म करके दिन में तीन बार दस दिनों तक सेवन करें। दमा-खांसी के लिए यह परमोपयोगी है। यदि गला बैठ जाए, जुकाम हो जाए तब भी यह योग लाभकारी है। दही, खटाई आदि का परहेज रखें।
42 खांसी-जुकाम :- अदरक को घी में तलकर भी ले सकते हैं। 12 ग्राम अदरक के टुकड़े करके 250 मिलीलीटर पानी में दूध और शक्कर मिलाकर चाय की भांति उबालकर पीने से खांसी और जुकाम ठीक हो जाता है। घी को गुड़ में डालकर गर्म करें। जब यह दोनों मिलकर एक रस हो जाये तो इसमें 12 ग्राम पिसी हुई सोंठ डाल दें। (यह एक मात्रा है) इसको सुबह खाने खाने के बाद प्रतिदिन सेवन करने से खांसी-जुकाम ठीक हो जाता है।
43 खांसी-जुकाम, सिरदर्द और वात ज्वर :- सोंठ तीन ग्राम, सात तुलसी के पत्ते, सात दाने कालीमिर्च 250 मिलीलीटर पानी में पकाकर, चीनी मिलाकर गमागर्म पीने से इन्फ्लुएंजा, खांसी, जुकाम और सिरदर्द दूर हो जाता है अथवा एक चम्मच सौंठ, चौथाई चम्मच सेंधानमक पीसकर चौथाई चम्मच तीन बार गर्म पानी से लें।
44 गर्दन, मांसपेशियों एवं आधे सिर का दर्द :- यदि उपरोक्त कष्ट अपच, पेट की गड़बड़ी से उत्पन्न हुए हो तो सोंठ को पीसकर उसमें थोड़ा-सा पानी डालकर लुग्दी बनाकर तथा हल्का-सा गर्म करके पीड़ित स्थान पर लेप करें। इस प्रयोग से आरम्भ में हल्की-सी जलन प्रतीत होती है, बाद में शाघ्र ही ठीक हो जाएगा। यदि जुकाम से सिरदर्द हो तो सोंठ को गर्म पानी में पीसकर लेप करें। पिसी हुई सौंठ को सूंघने से छीके आकर भी सिरदर्द दूर हो जाता है।
45 गले का बैठ जाना :- अदरक में छेद करके उसमें एक चने के बराबर हींग भरकर कपड़े में लपेटकर सेंक लें। उसके बाद इसको पीसकर मटर के दाने के आकार की गोली बना लें। दिन में एक-एक करके 8 गोलियां तक चूसें अथवा अदरक का रस शहद के रस में मिलाकर चूसने से भी गले की बैठी हुई आवाज खुल जाती है। आधा चम्मच अदरक का रस प्रत्येक आधा-आधा घंटे के अन्तराल में सेवन करने से खट्टी चीजें खाने के कारण बैठा हुआ गला ठीक हो जाता है। अदरक के रस को कुछ समय तक गले में रोकना चाहिए, इससे गला साफ हो जाता है।
46 कफज बुखार :- *आधा चम्मच पिसी हुई सोंठ एक कप पानी में उबालें, जब आधा पानी शेष बचे तो मिश्री मिलाकर सेवन कराएं।
*अदरक और पुदीना का काढ़ा देने से पसीना निकलकर बुखार उतर जाता है। शीत ज्वर में भी यह प्रयोग हितकारी है। अदरक और पुदीना वायु तथा कफ प्रकृति वाले के लिए परम हितकारी है।"
47 अपच :- ताजे अदरक का रस, नींबू का रस और सेंधानमक मिलाकर भोजन से पहले और बाद में सेवन करने से अपच दूर हो जाती है। इससे भोजन पचता है, खाने में रुचि बढ़ती है और पेट में गैस से होने वाला तनाव कम होता है। कब्ज भी दूर होती है। अदरक, सेंधानमक और कालीमिर्च की चटनी भोजन से आधा घंटे पहले तीन दिन तक निरन्तर खाने से अपच नहीं रहेगा।
48 पाचन संस्थान सम्बन्धी प्रयोग :- *6 ग्राम अदरक बारीक काटकर थोड़ा-सा नमक लगाकर दिन में एक बार 10 दिनों तक भोजन से पूर्व खाएं। इस योग के प्रयोग से हाजमा ठीक होगा, भूख लगेगी, पेट की गैस कब्ज दूर होगी। मुंह का स्वाद ठीक होगा, भूख बढे़गी और गले और जीभ में चिपका बलगम साफ होगा।
*सोंठ, हींग और कालानमक इन तीनों का चूर्ण गैस बाहर निकालता है। सोंठ, अजवाइन पीसकर नींबू के रस में गीला कर लें तथा इसे छाया में सुखाकर नमक मिला लें। इस चूर्ण को सुबह-शाम पानी से एक ग्राम की मात्रा में खाएं। इससे पाचन-विकार, वायु पीड़ा और खट्टी डकारों आदि की परेशानियां दूर हो जाती हैं।
*यदि पेट फूलता हो, बदहजमी हो तो अदरक के टुकड़े देशी घी में सेंक करके स्वादानुसार नमक डालकर दो बार प्रतिदिन खाएं। इस प्रयोग से पेट के समस्त सामान्य रोग ठीक हो जाते हैं।
*अदरक के एक लीटर रस में 100 ग्राम चीनी मिलाकर पकाएं। जब मिश्रण कुछ गाढ़ा हो जाए तो उसमें लौंग का चूर्ण पांच ग्राम और छोटी इलायची का चूर्ण पांच ग्राम मिलाकर शीशे के बर्तन में भरकर रखें। एक चम्मच उबले दूध या जल के साथ सुबह-शाम सेवन करने से पाचन संबधी सभी परेशानी ठीक होती है।"
49 कर्णनाद :- एक चम्मच सोंठ और एक चम्मच घी तथा 25 ग्राम गुड़ मिलाकर गर्म करके खाने से लाभ होता है।
50 आंव (कच्चा अनपचा अन्न) :- आंव अर्थात् कच्चा अनपचा अन्न। जब यह लम्बे समय तक पेट में रहता है तो अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। सम्पूर्ण पाचनसंस्थान ही बिगड़ जाता है। पेट के अनेक रोग पैदा हो जाते हैं। कमर दर्द, सन्धिवात, अपच, नींद न आना, सिरदर्द आदि आंव के कारण होते हैं। ये सब रोग प्रतिदिन दो चम्मच अदरक का रस सुबह खाली पेट सेवन करते रहने से ठीक हो जाते हैं।
51 बार-बार पेशाब आने की समस्या :- अदरक का रस और खड़ी शक्कर मिलाकर पीने से बहुमूत्र रोग की बीमारी नष्ट हो जाती है।
52 शीतपित्त :- *अदरक का रस और शहद पांच-पांच ग्राम मिलाकर पीने से सारे शरीर पर कण्डों की राख मलकर, कम्बल ओढ़कर सो जाने से शीतपित्त रोग तुरन्त दूर हो जाता है।
*अदरक का रस 5 मिलीलीटर चाटने से शीत पित्त का निवारण होता है।"
53 आधासीसी (आधे सिर का दर्द) :- *अदरक और गुड़ की पोटली बनाकर उसके रसबिन्दु को नाक में डालने से आधासीसी के दर्द में लाभ होता है।
*आधे सिर में दर्द होने पर नाक में अदरक के रस की बूंदें टपकाने से बहुत लाभ होता है।"
54 गले की खराश :- ठंडी के मौसम में खांसी के कारण गले में खराश होने पर अदरक के सात-आठ ग्राम रस में शहद मिलाकर, चाटकर खाने से बहुत लाभ होता है। खांसी का प्रकोप भी कम होता है।
55 अस्थमा के कारण उत्पन्न खांसी :- अदरक के 10 मिलीलीटर रस में 50 ग्राम शहद मिलाकर दिन में तीन-चार बार चाटकर खाने से सर्दी-जुकाम से उत्पन्न खांसी नष्ट होती है। चिकित्सकों के अनुसार अस्थमा के कारण उत्पन्न खांसी में भी अदरक से लाभ होता है।
56 तेज बुखार :- पांच ग्राम अदरक के रस में पांच ग्राम शहद मिलाकर चाटकर खाने से बेचैनी और गर्मी नष्ट होती है।
57 बहरापन :- *अदरक का रस हल्का गर्म करके बूंद-बूंद कान में डालने से बहरापन नष्ट होता है।
*अदरक के रस में शहद, तेल और थोड़ा सा सेंधानमक मिलाकर कान में डालने से बहरापन और कान के अन्य रोग समाप्त हो जाते हैं।"
58 जलोदर :- प्रतिदिन सुबह-शाम 5 से 10 मिलीलीटर अदरक का रस पानी में मिलाकर पीने से जलोदर रोग में बहुत लाभ होता है।
59 ठंड के मौसम में बार-बार मूत्र के लिए जाना :- दस ग्राम अदरक के रस में थोड़ा-सा शहद मिलाकर सेवन करने से बहुत लाभ होता है।
60 ज्वर (बुखार) :- *अदरक का रस पुदीने के क्वाथ (काढ़ा) में डालकर पीने से बुखार में राहत मिलती है।
*एक चम्मच शहद के साथ समान मात्रा में अदरक का रस मिलाकर दिन में 3-4 बार पिलायें।"
61 ठंडी के मौसम में आवाज बैठना :- अदरक के रस में सेंधानमक मिलाकर चाटने से बहुत लाभ होता है।
62 संधिशोथ (जोड़ों की सूजन) :- *अदरक को पीसकर संधिशोथ (जोड़ों की सूजन) पर लेप करने से सूजन और दर्द जल्द ही ठीक होते हैं।
*अदरक का 500 मिलीलीटर रस और 250 मिलीलीटर तिल का तेल दोनों को देर तक आग पर पकाएं। जब रस जलकर खत्म हो जाए तो तेल को छानकर रखें। इस तेल की मालिश करने से जोड़ों की सूजन में बहुत लाभ होता है। अदरक के रस में नारियल का तेल भी पकाकर इस्तेमाल कर सकते हैं।"
63 अम्लपित्त (खट्टी डकारें) :- *अदरक का रस पांच ग्राम मात्रा में 100 मिलीलीटर अनार के रस में मिलाकर कुछ दिनों तक सुबह-शाम सेवन करने से अम्लपित्त (खट्टी डकारें) की समस्या नहीं होती है।
*अदरक और धनिया को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर पानी के साथ पीने से लाभ होता है।।
*एक चम्मच अदरक का रस शहद में मिलाकर प्रयोग करने से आराम मिलता है।"
64 वायु विकार के कारण अंडकोष वृद्धि :- वायु विकार के कारण अंडकोष की वृद्धि होने पर अदरक के पांच ग्राम रस में शहद मिलाकर तीन-चार सप्ताह प्रतिदिन सेवन करने से बहुत लाभ होता है।
65 दमा :- *लगभग एक ग्राम अदरक के रस को एक ग्राम पानी से सुबह-शाम लेने से दमा और श्वास रोग ठीक हो जाते हैं।
*अदरक के रस में शहद मिलाकर खाने से सभी प्रकार के श्वास, खांसी, जुकाम तथा अरुचि आदि ठीक हो जाते हैं।
*अदरक के रस में कस्तूरी मिलाकर देने से श्वास-रोग ठीक हो जाता है।
*लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग जस्ता-भस्म में 6 मिलीलीटर अदरक का रस और 6 ग्राम शहद मिलाकर रोगी को देने से दमा और खांसी दूर हो जाती है।
*अदरक का रस शहद के साथ खाने से बुढ़ापे में होने वाला दमा ठीक हो जाता है।
*अदरक की चासनी में तेजपात और पीपल मिलाकर चाटने से श्वास-नली के रोग दूर हो जाते हैं।
*अदरक का छिलका उतारकर खूब महीन पीस लें और छुआरे के बीज निकालकर बारीक पीस लें। अब इन दोनों को शहद में मिलाकर किसी साफ बड़े बर्तन में अच्छी तरह से मिला लेते हैं। अब इसे हांडी में भरकर आटे से ढक्कन बंद करके रख दें। जमीन में हांडी के आकार का गड्ढा खोदकर इस गड्ढे में इस हांडी को रख दें और 36 घंटे बाद सावधानी से मिट्टी हटाकर हांडी को निकाल लें। इसके सुबह नाश्ते के समय तथा रात में सोने से पहले एक चम्मच की मात्रा में सेवन करें तथा ऊपर से एक गिलास मीठा, गुनगुने दूध को पी लेने से श्वास या दमा का रोग ठीक हो जाता है। इसका दो महीने तक लगातार सेवन करना चाहिए।
*अदरक का रस, लहसुन का रस, ग्वारपाठे का रस और शहद सभी को 50-50 ग्राम की मात्रा में लेकर चीनी या मिट्टी के बर्तन में भरकर उसका मुंह बंद करके जमीन में गड्ढा खोदकर गाड़कर मिट्टी से ढक देते हैं। 3 दिन के बाद उसे जमीन से बाहर निकाल लेते हैं। इसे 3-3 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन रोगी को सेवन कराने से 15 से 30 दिन में ही यह दमा मिट जाता है।"
66 ब्रोंकाइटिस :- 15 ग्राम अदरक, चार बादाम, 8 मुनक्का- इन सभी को पीसकर सुबह-शाम गर्म पानी से सेवन करने से ब्रोंकाइटिस में लाभ मिलता है।
67 गीली खांसी :- *अदरक का रस और शहद बराबर मात्रा में मिलाकर एक-एक चम्मच की मात्रा में लेकर थोड़ा सा गर्म करके दिन में 3-4 बार चाटने से 3-4 दिनों में कफ वाली गीली खांसी दूर हो जाती है।
*अदरक का रस 14 मिलीमीटर लेकर बराबर मात्रा में शहद के साथ मिलाकर दिन में दो बार लेना चाहिए।"
68 काली खांसी :- अदरक के रस को शहद में मिलाकर 2-3 बार चाटने से काली खांसी का असर खत्म हो जाता है।
69 बालों के रोग :- *अदरक और प्याज का रस सेंधानमक के साथ मिलाकर गंजे सिर पर मालिश करें, इससे गंजेपन से राहत मिलती है।
*अदरक के टुकडे़ को गंजे सिर पर मालिश करने से बालों के रोग मिट जाते हैं।"
70 साधारण खांसी :- *साधारण खांसी में अदरक का रस निकालकर उसमें थोड़ा शहद और थोड़ा सा काला नमक मिलाकर चाटने से लाभ मिलता है।
*अदरक का रस और तालीस-पत्र को मिलाकर चाटने से खांसी ठीक हो जाती है।
*बिना खांसी के कफ बढ़ा हो तो अदरक, नागरबेल का पान और तुलसी के पत्तों का रस निकालकर उसमें शहद मिलाकर सेवन करने से कफ दूर हो जाता है।
*अदरक के रस में इलायची का चूर्ण और शहद मिलाकर हल्का गर्म करके चाटने से सांस के रोग की खांसी दूर हो जाती है।
*एक चम्मच अदरक के रस में थोड़ा सा शहद मिलाकर चाटने से खांसी मे बहुत ही जल्द आराम आता है।"
71 इंफ्लुएन्जा के लिए :- *अदरक, तुलसी, कालीमिर्च तथा पटोल (परवल) के पत्ते का काढ़ा बनाकर सेवन करें।
*3 ग्राम अदरक या सोंठ, 7 तुलसी के पत्ते, 7 कालीमिर्च, जरा-सी दालचीनी आदि को 250 मिलीलीटर पानी में उबालकर चीनी मिलाकर गर्म-गर्म पीने से इंफ्लुएन्जा, जुकाम, खांसी और सिर में दर्द दूर होता है
1 हिचकी :- *सभी प्रकार की हिचकियों में अदरक की साफ की हुई छोटी डली चूसनी चाहिए।
*अदरक के बारीक टुकड़े को चूसने से हिचकी जल्द बंद हो जाती है। घी या पानी में सेंधानमक पीसकर मिलाकर सूंघने से हिचकी बंद हो जाती है।
*एक चम्मच अदरक का रस लेकर गाय के 250 मिलीलीटर ताजे दूध में मिलाकर पीने से हिचकी में फायदा होता है।
*एक कप दूध को उबालकर उसमें आधा चम्मच सोंठ का चूर्ण डाल दें और ठंडा करके पिलाएं।
*ताजे अदरक के छोटे-छोटे टुकड़े करके चूसने से पुरानी एवं नई तथा लगातार उठने वाली हिचकियां बंद हो जाती हैं। समस्त प्रकार की असाध्य हिचकियां दूर करने का यह एक प्राकृतिक उपाय है।"
2 पेट दर्द :- *अदरक और लहसुन को बराबर की मात्रा में पीसकर एक चम्मच की मात्रा में पानी से सेवन कराएं।
*पिसी हुई सोंठ एक ग्राम और जरा-सी हींग और सेंधानमक की फंकी गर्म पानी से लेने से पेट दर्द ठीक हो जाता है। एक चम्मच पिसी हुई सोंठ और सेंधानमक एक गिलास पानी में गर्म करके पीने से पेट दर्द, कब्ज, अपच ठीक हो जाते हैं।
*अदरक और पुदीना का रस आधा-आधा तोला लेकर उसमें एक ग्राम सेंधानमक डालकर पीने से पेट दर्द में तुरन्त लाभ होता है।
*अदरक का रस और तुलसी के पत्ते का रस 2-2 चम्मच थोड़े से गर्म पानी के साथ पिलाने से पेट का दर्द शांत हो जाता है।
*एक कप गर्म पानी में थोड़ा अजवायन डालकर 2 चम्मच अदरक का रस डालकर पीने से लाभ होता है।
*अदरक के रस में नींबू का रस मिलाकर उस पर कालीमिर्च का पिसा हुआ चूर्ण डालकर चाटने से पेट के दर्द में आराम मिलता है।
*अदरक का रस 5 मिलीलीटर, नींबू का रस 5 मिलीलीटर, कालीमिर्च का चूर्ण 1 ग्राम को मिलाकर पीने से पेट का दर्द समाप्त होता है।"
3 मुंह की दुर्गध :- एक चम्मच अदरक का रस एक गिलास गर्म पानी में मिलाकर कुल्ला करने से मुख की दुर्गन्ध दूर हो जाती है।
4 दांत का दर्द:- *महीन पिसा हुआ सेंधानमक अदरक के रस में मिलाकर दर्द वाले दांत पर लगाएं।
*दांतों में अचानक दर्द होने पर अदरक के छोट-छोटे टुकड़े को छीलकर दर्द वाले दांत के नीचे दबाकर रखें।
*सर्दी की वजह से दांत के दर्द में अदरक के टुकड़ों को दांतों के बीच दबाने से लाभ होता है। "
5 भूख की कमी:- अदरक के छोटे-छोटे टुकड़ों को नींबू के रस में भिगोकर इसमें सेंधानमक मिला लें, इसे भोजन करने से पहले नियमित रूप से खिलाएं।
6 सर्दी-जुकाम:- पानी में गुड़, अदरक, नींबू का रस, अजवाइन, हल्दी को बराबर की मात्रा में डालकर उबालें और फिर इसे छानकर पिलाएं।
7 गला खराब होना:- अदरक, लौंग, हींग और नमक को मिलाकर पीस लें और इसकी छोटी-छोटी गोलियां तैयार करें। दिन में 3-4 बार एक-एक गोली चूसें।
8 पक्षाघात (लकवा):- *घी में उड़द की दाल भूनकर, इसकी आधी मात्रा में गुड़ और सोंठ मिलाकर पीस लें। इसे दो चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार खिलाएं।
*उड़द की दाल पीसकर घी में सेकें फिर उसमें गुड़ और सौंठ पीसकर मिलाकर लड्डू बनाकर रख लें। एक लड्डू प्रतिदिन खाएं या सोंठ और उड़द उबालकर इनका पानी पीयें। इससे भी लकवा ठीक हो जाता है।"
9 पेट और सीने की जलन :- एक गिलास गन्ने के रस में दो चम्मच अदरक का रस और एक चम्मच पुदीने का रस मिलाकर पिलाएं।
10 वात और कमर के दर्द:- अदरक का रस नारियल के तेल में मिलाकर मालिश करें और सोंठ को देशी घी में मिलाकर खिलाएं।
11 पसली का दर्द :- 30 ग्राम सोंठ को आधा किलो पानी में उबालकर और छानकर 4 बार पीने से पसली का दर्द खत्म हो जाता है।
12 चोट लगना, कुचल जाना:- चोट लगने, भारी चीज उठाने या कुचल जाने से
पीड़ित स्थान पर अदरक को पीसकर गर्म करके आधा इंच मोटा लेप करके पट्टी बॉंध दें। दो घण्टे के बाद पट्टी हटाकर ऊपर सरसो का तेल लगाकर सेंक करें। यह प्रयोग प्रतिदिन एक बार करने से दर्द शीघ्र ही दूर हो जाता है।
13 संग्रहणी (खूनी दस्त) :- सोंठ, नागरमोथा, अतीस, गिलोय, इन्हें समभाग लेकर पानी के साथ काढ़ा बनाए। इस काढे़ को सुबह-शाम पीने से राहत मिलती है।
14 ग्रहणी (दस्त) :- गिलोय, अतीस, सोंठ नागरमोथा का काढ़ा बनाकर 20 से 25 मिलीलीटर दिन में दो बार दें।
15 भूखवर्द्धक :- *दो ग्राम सोंठ का चूर्ण घी के साथ अथवा केवल सोंठ का चूर्ण गर्म पानी के साथ प्रतिदिन सुबह-सुबह खाने से भूख बढ़ती है।
*प्रतिदिन भोजन से पहले नमक और अदरक की चटनी खाने से जीभ और गले की शुद्धि होती है तथा भूख बढ़ती है।
*अदरक का अचार खाने से भूख बढ़ती है।
*सोंठ और पित्तपापड़ा का पाक (काढ़ा) बुखार में राहत देने वाला और भूख बढ़ाने वाला है। इसे पांच से दस ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सेवन करें।
*सोंठ, चिरायता, नागरमोथा, गिलोय का काढ़ा बनाकर सेवन करने से भूख बढ़ती है और बुखार में भी लाभदायक है।"
16 अजीर्ण :- *यदि प्रात:काल अजीर्ण (रात्रि का भोजन न पचने) की शंका हो तो हरड़, सोंठ तथा सेंधानमक का चूर्ण जल के साथ लें। दोपहर या शाम को थोड़ा भोजन करें।
*अजवायन, सेंधानमक, हरड़, सोंठ इनके चूर्णों को एक समान मात्रा में एकत्रित करें। एक-एक चम्मच प्रतिदिन सेवन करें।
*अदरक के 10-20 मिलीलीटर रस में समभाग नींबू का रस मिलाकर पिलाने से मंदाग्नि दूर होती है।"
17 उदर (पेट के) रोग :- सोंठ, हरीतकी, बहेड़ा, आंवला इनको समभाग लेकर कल्क बना लें। गाय का घी तथा तिल का तेल ढाई किलोग्राम, दही का पानी ढाई किलोग्राम, इन सबको मिलाकर विधिपूर्वक घी का पाक करें, तैयार हो जाने पर छानकर रख लें। इस घी का सेवन 10 से 20 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम करने से सभी प्रकार के पेट के रोगों का नाश होता है।
18 बहुमूत्र :- अरदक के दो चम्मच रस में मिश्री मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से लाभ होता है।
19 बवासीर के कारण होने वाला दर्द :- दुर्लभा और पाठा, बेल का गूदा और पाठा, अजवाइन व पाठा अथवा सौंठ और पाठा इनमें से किसी एक योग का सेवन करने से बवासीर के कारण होने वाले दर्द में राहत मिलती है।
20 मूत्रकृच्छ (पेशाब करते समय परेशानी) :- *सोंठ, कटेली की जड़, बला मूल, गोखरू इन सबको दो-दो ग्राम मात्रा तथा 10 ग्राम गुड़ को 250 मिलीलीटर दूध में उबालकर सुबह-शाम पीने से मल-मूत्र के समय होने वाला दर्द ठीक होता है।
*सोंठ पीसकर छानकर दूध में मिश्री मिलाकर पिलाएं।"
21 अंडकोषवृद्धि :- इसके 10-20 मिलीलीटर रस में दो चम्मच शहद मिलाकर पीने से वातज अंडकोष की वृद्धि मिटती है।
22 कामला (पीलिया) :- अदरक, त्रिफला और गुड़ के मिश्रण का सेवन करने से लाभ होता है।
23 अतिसार (दस्त):- *सोंठ, खस, बेल की गिरी, मोथा, धनिया, मोचरस तथा नेत्रबाला का काढ़ा दस्तनाशक तथा पित्त-कफ ज्वर नाशक है।
*धनिया 10 ग्राम, सोंठ 10 ग्राम इनका विधिवत काढ़ा बनाकर रोगी को सुबह-शाम सेवन कराने से दस्त में काफी राहत मिलती है।"
24 वातरक्त :- अंशुमती के काढ़ा में 640 मिलीलीटर दूध को पकाकर उसमें 80 ग्राम मिश्री मिलाकर पीने के लिए दें। उसी प्रकार पिप्पली और सौंठ का काढ़ा तैयार करके 20 मिलीलीटर प्रात:-शाम वातरक्त के रोगी को पीने के लिए दें।
25 वातशूल :- सोंठ तथा एरंड के जड़ के काढे़ में हींग और सौवर्चल नमक मिलाकर पीने से वात शूल नष्ट होता है।
26 सूजन :- *सोंठ, पिप्पली, जमालगोटा की जड़, चित्रकमूल, बायविडिंग इन सभी को समान भाग लें और दूनी मात्रा में हरीतकी चूर्ण लेकर इस चूर्ण का सेवन तीन से छ: ग्राम की मात्रा में गर्म पानी के साथ सुबह करें।
*सोंठ, पिप्पली, पान, गजपिप्पली, छोटी कटेरी, चित्रकमूल, पिप्पलामूल, हल्दी, जीरा, मोथा इन सभी द्रव्यों को समभाग लेकर इनके कपडे़ से छानकर चूर्ण को मिलाकर रख लें, इस चूर्ण को दो ग्राम की मात्रा में गुनगुने पानी के साथ दिन में तीन बार सेवन करने से त्रिदोष के कारण उत्पन्न सूजन तथा पुरानी सूजन नष्ट होती है।
*अदरक के 10 से 20 मिलीलीटर रस में गुड़ मिलाकर सुबह-सुबह पी लें। इससे सभी प्रकार की सूजन जल्दी ही खत्म हो जाती है।"
27 शूल (दर्द) :- सोंठ के काढ़े के साथ कालानमक, हींग तथा सोंठ के मिश्रित चूर्ण का सेवन करने से कफवातज हृदयशूल, पीठ का दर्द, कमर का दर्द, जलोदर, तथा विसूचिका आदि रोग नष्ट होते हैं। यदि मल बंद होता है तो इसके चूर्ण को जौ के साथ पीना चाहिए।
28 संधिपीड़ा (जोड़ों का दर्द) :- *अदरक के एक किलोग्राम रस में 500 मिलीलीटर तिल का तेल डालकर आग पर पकाना चाहिए, जब रस जलकर तेल मात्र रह जाये, तब उतारकर छान लेना चाहिए। इस तेल की शरीर पर मालिश करने से जोड़ों की पीड़ा मिटती है।
*अदरक के रस को गुनगुना गर्म करके इससे मालिश करें।"
29 बुखार में बार-बार प्यास लगना :- सोंठ, पित्तपापड़ा, नागरमोथा, खस लाल चंदन, सुगन्ध बेला इन सबको समभाग लेकर बनाये गये काढ़े को थोड़ा-थोड़ा पीने से बुखार तथा प्यास शांत होती है। यह उस रोगी को देना चाहिए जिसे बुखार में बार-बार प्यास लगती है।
30 कुष्ठ (कोढ़) :- सोंठ, मदार की पत्ती, अडूसा की पत्ती, निशोथ, बड़ी इलायची, कुन्दरू इन सबका समान-समान मात्रा में बने चूर्ण को पलाश के क्षार और गोमूत्र में घोलकर बने लेप को लगाकर धूप में तब तक बैठे जब तक वह सूख न जाए, इससे मण्डल कुष्ठ फूट जाता है और उसके घाव शीघ्र ही भर जाते हैं।
31 बुखार में जलन :- सोंठ, गन्धबाला, पित्तपापड़ा खस, मोथा, लाल चंदन इनका काढ़ा ठंडा करके सेवन करने से प्यास के साथ उल्टी, पित्तज्वर तथा जलन आदि ठीक हो जाती है।
32 हैजा :- अदरक का 10 ग्राम, आक की जड़ 10 ग्राम, इन दोनों को खरल (कूटकर) इसकी कालीमिर्च के बराबर गोली बना लें। इन गोलियों को गुनगुने पानी के साथ देने से हैजे में लाभ पहुंचता है इसी प्रकार अदरक का रस व तुलसी का रस समान भाग लेकर उसमें थोड़ी सी शहद अथवा थोड़ी सा मोर के पंख की भस्म मिलाने से भी हैजे में लाभ पहुंचता है।
33 इन्फ्लुएंजा :- 6 मिलीलीटर अदरक रस में, 6 ग्राम शहद मिलाकर दिन में तीन-चार बार सेवन करें।
34 सन्निपात ज्वर :- *त्रिकुटा, सेंधानमक और अदरक का रस मिलाकर कुछ दिनों तक सुबह-शाम चटायें।
*सन्निपात की दशा में जब शरीर ठंडा पड़ जाए तो इसके रस में थोड़ा लहसुन का रस मिलाकर मालिश करने से गरमाई आ जाती है।"
35 गठिया :- 10 ग्राम सोंठ 100 मिलीलीटर पानी में उबालकर ठंडा होने पर शहद या शक्कर मिलाकर सेवन करने से गठिया रोग दूर हो जाता है।
36 वात दर्द, कमर दर्द तथा जांघ और गृध्रसी दर्द :- एक चम्मच अदरक के रस में आधा चम्मच घी मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है।
37 मासिक-धर्म का दर्द से होना (कष्टर्त्तव) :- इस कष्ट में सोंठ और पुराने गुड़ का काढ़ा बनाकर पीना लाभकारी है। ठंडे पानी और खट्टी चीजों से परहेज रखें।
38 प्रदर :- 10 ग्राम सोंठ 250 मिलीलीटर पानी में डालकर उबालें और शीशी में छानकर रख लें। इसे 3 सप्ताह तक पीएं।
39 हाथ-पैर सुन्न हो जाना :- सोंठ और लहसुन की एक-एक गांठ में पानी डालकर पीस लें तथा प्रभावित अंग पर इसका लेप करें। सुबह खाली पेट जरा-सी सोंठ और लहसुन की दो कली प्रतिदिन 10 दिनों तक चबाएं।
40 मसूढ़े फूलना (मसूढ़ों की सूजन) :- *मसूढ़े फूल जाएं तो तीन ग्राम सोंठ को दिन में एक बार पानी के साथ फांकें। इससे दांत का दर्द ठीक हो जाता है। यदि दांत में दर्द सर्दी से हो तो अदरक पर नमक डालकर पीड़ित दांतों के नीचे रखें।
*मसूढ़ों के फूल जाने पर 3 ग्राम सूखा अदरक दिन में 1 बार गर्म पानी के साथ खायें। इससे रोग में लाभ होता है।
*अदरक के रस में नमक मिलाकर रोजाना सुबह-शाम मलने से सूजन ठीक होती है।"
41 गला बैठना, श्वांस-खांसी और जुकाम :- अदरक का रस और शहद 30-30 ग्राम हल्का गर्म करके दिन में तीन बार दस दिनों तक सेवन करें। दमा-खांसी के लिए यह परमोपयोगी है। यदि गला बैठ जाए, जुकाम हो जाए तब भी यह योग लाभकारी है। दही, खटाई आदि का परहेज रखें।
42 खांसी-जुकाम :- अदरक को घी में तलकर भी ले सकते हैं। 12 ग्राम अदरक के टुकड़े करके 250 मिलीलीटर पानी में दूध और शक्कर मिलाकर चाय की भांति उबालकर पीने से खांसी और जुकाम ठीक हो जाता है। घी को गुड़ में डालकर गर्म करें। जब यह दोनों मिलकर एक रस हो जाये तो इसमें 12 ग्राम पिसी हुई सोंठ डाल दें। (यह एक मात्रा है) इसको सुबह खाने खाने के बाद प्रतिदिन सेवन करने से खांसी-जुकाम ठीक हो जाता है।
43 खांसी-जुकाम, सिरदर्द और वात ज्वर :- सोंठ तीन ग्राम, सात तुलसी के पत्ते, सात दाने कालीमिर्च 250 मिलीलीटर पानी में पकाकर, चीनी मिलाकर गमागर्म पीने से इन्फ्लुएंजा, खांसी, जुकाम और सिरदर्द दूर हो जाता है अथवा एक चम्मच सौंठ, चौथाई चम्मच सेंधानमक पीसकर चौथाई चम्मच तीन बार गर्म पानी से लें।
44 गर्दन, मांसपेशियों एवं आधे सिर का दर्द :- यदि उपरोक्त कष्ट अपच, पेट की गड़बड़ी से उत्पन्न हुए हो तो सोंठ को पीसकर उसमें थोड़ा-सा पानी डालकर लुग्दी बनाकर तथा हल्का-सा गर्म करके पीड़ित स्थान पर लेप करें। इस प्रयोग से आरम्भ में हल्की-सी जलन प्रतीत होती है, बाद में शाघ्र ही ठीक हो जाएगा। यदि जुकाम से सिरदर्द हो तो सोंठ को गर्म पानी में पीसकर लेप करें। पिसी हुई सौंठ को सूंघने से छीके आकर भी सिरदर्द दूर हो जाता है।
45 गले का बैठ जाना :- अदरक में छेद करके उसमें एक चने के बराबर हींग भरकर कपड़े में लपेटकर सेंक लें। उसके बाद इसको पीसकर मटर के दाने के आकार की गोली बना लें। दिन में एक-एक करके 8 गोलियां तक चूसें अथवा अदरक का रस शहद के रस में मिलाकर चूसने से भी गले की बैठी हुई आवाज खुल जाती है। आधा चम्मच अदरक का रस प्रत्येक आधा-आधा घंटे के अन्तराल में सेवन करने से खट्टी चीजें खाने के कारण बैठा हुआ गला ठीक हो जाता है। अदरक के रस को कुछ समय तक गले में रोकना चाहिए, इससे गला साफ हो जाता है।
46 कफज बुखार :- *आधा चम्मच पिसी हुई सोंठ एक कप पानी में उबालें, जब आधा पानी शेष बचे तो मिश्री मिलाकर सेवन कराएं।
*अदरक और पुदीना का काढ़ा देने से पसीना निकलकर बुखार उतर जाता है। शीत ज्वर में भी यह प्रयोग हितकारी है। अदरक और पुदीना वायु तथा कफ प्रकृति वाले के लिए परम हितकारी है।"
47 अपच :- ताजे अदरक का रस, नींबू का रस और सेंधानमक मिलाकर भोजन से पहले और बाद में सेवन करने से अपच दूर हो जाती है। इससे भोजन पचता है, खाने में रुचि बढ़ती है और पेट में गैस से होने वाला तनाव कम होता है। कब्ज भी दूर होती है। अदरक, सेंधानमक और कालीमिर्च की चटनी भोजन से आधा घंटे पहले तीन दिन तक निरन्तर खाने से अपच नहीं रहेगा।
48 पाचन संस्थान सम्बन्धी प्रयोग :- *6 ग्राम अदरक बारीक काटकर थोड़ा-सा नमक लगाकर दिन में एक बार 10 दिनों तक भोजन से पूर्व खाएं। इस योग के प्रयोग से हाजमा ठीक होगा, भूख लगेगी, पेट की गैस कब्ज दूर होगी। मुंह का स्वाद ठीक होगा, भूख बढे़गी और गले और जीभ में चिपका बलगम साफ होगा।
*सोंठ, हींग और कालानमक इन तीनों का चूर्ण गैस बाहर निकालता है। सोंठ, अजवाइन पीसकर नींबू के रस में गीला कर लें तथा इसे छाया में सुखाकर नमक मिला लें। इस चूर्ण को सुबह-शाम पानी से एक ग्राम की मात्रा में खाएं। इससे पाचन-विकार, वायु पीड़ा और खट्टी डकारों आदि की परेशानियां दूर हो जाती हैं।
*यदि पेट फूलता हो, बदहजमी हो तो अदरक के टुकड़े देशी घी में सेंक करके स्वादानुसार नमक डालकर दो बार प्रतिदिन खाएं। इस प्रयोग से पेट के समस्त सामान्य रोग ठीक हो जाते हैं।
*अदरक के एक लीटर रस में 100 ग्राम चीनी मिलाकर पकाएं। जब मिश्रण कुछ गाढ़ा हो जाए तो उसमें लौंग का चूर्ण पांच ग्राम और छोटी इलायची का चूर्ण पांच ग्राम मिलाकर शीशे के बर्तन में भरकर रखें। एक चम्मच उबले दूध या जल के साथ सुबह-शाम सेवन करने से पाचन संबधी सभी परेशानी ठीक होती है।"
49 कर्णनाद :- एक चम्मच सोंठ और एक चम्मच घी तथा 25 ग्राम गुड़ मिलाकर गर्म करके खाने से लाभ होता है।
50 आंव (कच्चा अनपचा अन्न) :- आंव अर्थात् कच्चा अनपचा अन्न। जब यह लम्बे समय तक पेट में रहता है तो अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। सम्पूर्ण पाचनसंस्थान ही बिगड़ जाता है। पेट के अनेक रोग पैदा हो जाते हैं। कमर दर्द, सन्धिवात, अपच, नींद न आना, सिरदर्द आदि आंव के कारण होते हैं। ये सब रोग प्रतिदिन दो चम्मच अदरक का रस सुबह खाली पेट सेवन करते रहने से ठीक हो जाते हैं।
51 बार-बार पेशाब आने की समस्या :- अदरक का रस और खड़ी शक्कर मिलाकर पीने से बहुमूत्र रोग की बीमारी नष्ट हो जाती है।
52 शीतपित्त :- *अदरक का रस और शहद पांच-पांच ग्राम मिलाकर पीने से सारे शरीर पर कण्डों की राख मलकर, कम्बल ओढ़कर सो जाने से शीतपित्त रोग तुरन्त दूर हो जाता है।
*अदरक का रस 5 मिलीलीटर चाटने से शीत पित्त का निवारण होता है।"
53 आधासीसी (आधे सिर का दर्द) :- *अदरक और गुड़ की पोटली बनाकर उसके रसबिन्दु को नाक में डालने से आधासीसी के दर्द में लाभ होता है।
*आधे सिर में दर्द होने पर नाक में अदरक के रस की बूंदें टपकाने से बहुत लाभ होता है।"
54 गले की खराश :- ठंडी के मौसम में खांसी के कारण गले में खराश होने पर अदरक के सात-आठ ग्राम रस में शहद मिलाकर, चाटकर खाने से बहुत लाभ होता है। खांसी का प्रकोप भी कम होता है।
55 अस्थमा के कारण उत्पन्न खांसी :- अदरक के 10 मिलीलीटर रस में 50 ग्राम शहद मिलाकर दिन में तीन-चार बार चाटकर खाने से सर्दी-जुकाम से उत्पन्न खांसी नष्ट होती है। चिकित्सकों के अनुसार अस्थमा के कारण उत्पन्न खांसी में भी अदरक से लाभ होता है।
56 तेज बुखार :- पांच ग्राम अदरक के रस में पांच ग्राम शहद मिलाकर चाटकर खाने से बेचैनी और गर्मी नष्ट होती है।
57 बहरापन :- *अदरक का रस हल्का गर्म करके बूंद-बूंद कान में डालने से बहरापन नष्ट होता है।
*अदरक के रस में शहद, तेल और थोड़ा सा सेंधानमक मिलाकर कान में डालने से बहरापन और कान के अन्य रोग समाप्त हो जाते हैं।"
58 जलोदर :- प्रतिदिन सुबह-शाम 5 से 10 मिलीलीटर अदरक का रस पानी में मिलाकर पीने से जलोदर रोग में बहुत लाभ होता है।
59 ठंड के मौसम में बार-बार मूत्र के लिए जाना :- दस ग्राम अदरक के रस में थोड़ा-सा शहद मिलाकर सेवन करने से बहुत लाभ होता है।
60 ज्वर (बुखार) :- *अदरक का रस पुदीने के क्वाथ (काढ़ा) में डालकर पीने से बुखार में राहत मिलती है।
*एक चम्मच शहद के साथ समान मात्रा में अदरक का रस मिलाकर दिन में 3-4 बार पिलायें।"
61 ठंडी के मौसम में आवाज बैठना :- अदरक के रस में सेंधानमक मिलाकर चाटने से बहुत लाभ होता है।
62 संधिशोथ (जोड़ों की सूजन) :- *अदरक को पीसकर संधिशोथ (जोड़ों की सूजन) पर लेप करने से सूजन और दर्द जल्द ही ठीक होते हैं।
*अदरक का 500 मिलीलीटर रस और 250 मिलीलीटर तिल का तेल दोनों को देर तक आग पर पकाएं। जब रस जलकर खत्म हो जाए तो तेल को छानकर रखें। इस तेल की मालिश करने से जोड़ों की सूजन में बहुत लाभ होता है। अदरक के रस में नारियल का तेल भी पकाकर इस्तेमाल कर सकते हैं।"
63 अम्लपित्त (खट्टी डकारें) :- *अदरक का रस पांच ग्राम मात्रा में 100 मिलीलीटर अनार के रस में मिलाकर कुछ दिनों तक सुबह-शाम सेवन करने से अम्लपित्त (खट्टी डकारें) की समस्या नहीं होती है।
*अदरक और धनिया को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर पानी के साथ पीने से लाभ होता है।।
*एक चम्मच अदरक का रस शहद में मिलाकर प्रयोग करने से आराम मिलता है।"
64 वायु विकार के कारण अंडकोष वृद्धि :- वायु विकार के कारण अंडकोष की वृद्धि होने पर अदरक के पांच ग्राम रस में शहद मिलाकर तीन-चार सप्ताह प्रतिदिन सेवन करने से बहुत लाभ होता है।
65 दमा :- *लगभग एक ग्राम अदरक के रस को एक ग्राम पानी से सुबह-शाम लेने से दमा और श्वास रोग ठीक हो जाते हैं।
*अदरक के रस में शहद मिलाकर खाने से सभी प्रकार के श्वास, खांसी, जुकाम तथा अरुचि आदि ठीक हो जाते हैं।
*अदरक के रस में कस्तूरी मिलाकर देने से श्वास-रोग ठीक हो जाता है।
*लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग जस्ता-भस्म में 6 मिलीलीटर अदरक का रस और 6 ग्राम शहद मिलाकर रोगी को देने से दमा और खांसी दूर हो जाती है।
*अदरक का रस शहद के साथ खाने से बुढ़ापे में होने वाला दमा ठीक हो जाता है।
*अदरक की चासनी में तेजपात और पीपल मिलाकर चाटने से श्वास-नली के रोग दूर हो जाते हैं।
*अदरक का छिलका उतारकर खूब महीन पीस लें और छुआरे के बीज निकालकर बारीक पीस लें। अब इन दोनों को शहद में मिलाकर किसी साफ बड़े बर्तन में अच्छी तरह से मिला लेते हैं। अब इसे हांडी में भरकर आटे से ढक्कन बंद करके रख दें। जमीन में हांडी के आकार का गड्ढा खोदकर इस गड्ढे में इस हांडी को रख दें और 36 घंटे बाद सावधानी से मिट्टी हटाकर हांडी को निकाल लें। इसके सुबह नाश्ते के समय तथा रात में सोने से पहले एक चम्मच की मात्रा में सेवन करें तथा ऊपर से एक गिलास मीठा, गुनगुने दूध को पी लेने से श्वास या दमा का रोग ठीक हो जाता है। इसका दो महीने तक लगातार सेवन करना चाहिए।
*अदरक का रस, लहसुन का रस, ग्वारपाठे का रस और शहद सभी को 50-50 ग्राम की मात्रा में लेकर चीनी या मिट्टी के बर्तन में भरकर उसका मुंह बंद करके जमीन में गड्ढा खोदकर गाड़कर मिट्टी से ढक देते हैं। 3 दिन के बाद उसे जमीन से बाहर निकाल लेते हैं। इसे 3-3 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन रोगी को सेवन कराने से 15 से 30 दिन में ही यह दमा मिट जाता है।"
66 ब्रोंकाइटिस :- 15 ग्राम अदरक, चार बादाम, 8 मुनक्का- इन सभी को पीसकर सुबह-शाम गर्म पानी से सेवन करने से ब्रोंकाइटिस में लाभ मिलता है।
67 गीली खांसी :- *अदरक का रस और शहद बराबर मात्रा में मिलाकर एक-एक चम्मच की मात्रा में लेकर थोड़ा सा गर्म करके दिन में 3-4 बार चाटने से 3-4 दिनों में कफ वाली गीली खांसी दूर हो जाती है।
*अदरक का रस 14 मिलीमीटर लेकर बराबर मात्रा में शहद के साथ मिलाकर दिन में दो बार लेना चाहिए।"
68 काली खांसी :- अदरक के रस को शहद में मिलाकर 2-3 बार चाटने से काली खांसी का असर खत्म हो जाता है।
69 बालों के रोग :- *अदरक और प्याज का रस सेंधानमक के साथ मिलाकर गंजे सिर पर मालिश करें, इससे गंजेपन से राहत मिलती है।
*अदरक के टुकडे़ को गंजे सिर पर मालिश करने से बालों के रोग मिट जाते हैं।"
70 साधारण खांसी :- *साधारण खांसी में अदरक का रस निकालकर उसमें थोड़ा शहद और थोड़ा सा काला नमक मिलाकर चाटने से लाभ मिलता है।
*अदरक का रस और तालीस-पत्र को मिलाकर चाटने से खांसी ठीक हो जाती है।
*बिना खांसी के कफ बढ़ा हो तो अदरक, नागरबेल का पान और तुलसी के पत्तों का रस निकालकर उसमें शहद मिलाकर सेवन करने से कफ दूर हो जाता है।
*अदरक के रस में इलायची का चूर्ण और शहद मिलाकर हल्का गर्म करके चाटने से सांस के रोग की खांसी दूर हो जाती है।
*एक चम्मच अदरक के रस में थोड़ा सा शहद मिलाकर चाटने से खांसी मे बहुत ही जल्द आराम आता है।"
71 इंफ्लुएन्जा के लिए :- *अदरक, तुलसी, कालीमिर्च तथा पटोल (परवल) के पत्ते का काढ़ा बनाकर सेवन करें।
*3 ग्राम अदरक या सोंठ, 7 तुलसी के पत्ते, 7 कालीमिर्च, जरा-सी दालचीनी आदि को 250 मिलीलीटर पानी में उबालकर चीनी मिलाकर गर्म-गर्म पीने से इंफ्लुएन्जा, जुकाम, खांसी और सिर में दर्द दूर होता है
Sunday, 9 October 2016
गंजेपन के कारण,घरेलु उपचार
वर्तमान समय में तेजी से बदलती जीवन शैली और अनियमित खान पान कारण स्त्री पुरुषों दोनों में ही गंजेपन की समस्या बढ़ती ही जा रही है। आम तौर पर किसी भी सेहतमंद व्यक्ति के 50 से 100 बाल प्रतिदिन झड़ते हैं लेकिन अगर उसके बाल रोजाना 100 से अधिक झड़ते हैं और नए बाल तेजी से नहीं उगते है और जो उगते है वह कमजोर होते है तो यह गंजेपन का लक्षण हो सकता हैं ।
गंजापन अधिकतर पुरुषों में ज्यादा होता है । पुरुषों में आमतौर पर गंजेपन के लिए मेल हार्मोन को जिम्मेदार मानते है। शायद यही वजह है महिलाओं में गंजापन बहुत ही कम होता है। गंजापन अनुवांशिक भी होता है और पीढ़ी दर पीढ़ी भी इसका असर रहता है। यहाँ पर हम आपको कुछ घरेलू नुस्खे बता रहे है जिसके जरिए गंजेपन के असर को कम कर सकते है । और यदि आप इन उपचारो को समय रहते कर लें तो आप अपने बालों को मजबूत करके गंजेपन को रोक भी सकते हैं।
गंजेपन के कारण
गंजेपन के कई कारण हो सकते है। जैसे :----
* किसी बीमारी या किसी दवा के दुष परिणामो के कारण
* शरीर में विटामिन की कमी के कारण
* बालो को प्रतिदिन शैंपू या साबुन से धोना
* आनुवंशिक कारणों या उम्र बढ़ने के कारण
* पिट्यूटरी ग्लैंड में हार्मोन्स की कमी के कारण
* शरीर में पोषक तत्वों की कमी के कारण
* बालो की जड़ो का कमजोर हो जाने के कारण
* सर में अधिक रुसी होने कर कारण
* लगातार सर दर्द के कारण सर में रक्त संचार का सही ना होना
* गंभीर रूप से बीमार पड़ने या बुखार होने के कारण
* भावनात्मक या शारीरिक तनाव के कारण
* केमोथेरेपी या अत्यधिक विटामिन ए के कारण
* सुगंधित एवं तेज शैम्पू / तेल के दुष प्रभावों के कारण
* बालों को बहुत ज्यादा कलर या डाई करने के कारण
* दाद, एक्जिमा, और सर पर सफ़ेद दाग के कारण
* धूम्रपान के दुष प्रभावों के कारण
* प्रदूषित वातावरण, बालों का लम्बे समय तक गंदे रहने के कारण
यह सब कुछ प्रमुख कारण है जिनकी वजह से बाल तेजी से गिरते है और गंजेपन की समस्या होती है ।
गंजेपन के घरेलु उपचार
* नमक का अधिक सेवन बिलकुल भी नहीं करना चाहिए । नमक के अधिक सेवन करने से गंजापन जल्दी आ जाता है।
* अगर सर में बीच बीच में कई स्थानो से बाल गायब हो जाये, जगह जगह गंजेपन का पैच बन जाये तो उस स्थान पर दिन में 2 - 3 बार नीबू रगड़ते रहने से बाल दुबारा उगने शुरू हो जाते है ।
* उड़द की दाल उबालकर उसे पीस लें। फिर इसको सोते समय सिर पर गंजेपन में लगाये , इससे बहुत लाभ मिलता है ।
* जहां जहाँ से बाल उड़ रहे हो तो वहाँ पर प्याज का रस रगड़ते रहने से बाल पुन: आने लगते हैं।
* गंजेपन पर हरे धनिए को पीस कर उसका लेप करने से भी बाल उगने लगते हैं।
* अगर आपके परिवार में लोग गंजेपन के शिकार है अर्थात यह समस्या अनुवांशिक है तो खाने में लहसुन का अधिक से अधिक प्रयोग करें।
* नीम की पत्तियों और आंवले के चूर्ण को पानी में एक साथ डालकर उबाल लें इस पानी से सप्ताह में कम से कम दो बार सिर को धोएं ।
* अगर आपके बाल उड़ते हो तो बालों में नीम का तेल लगाइये । नीम का तेल लगाने से बालो की जड़े मजबूत होते है और उनका उड़ना / टूटना कम हो जाता है ।
* जैतून के तेल को गर्म करके उसमे एक चम्मच शहद और एक चम्मच दालचीनी पाउडर मिलाकर उसका पेस्ट बनाएं। इस पेस्ट को नहाने से पहले अपने सिर पर लगा लें। फिर 15 मिनट बाद अपने सिर को गरम पानी से धो लें । ऐसा करने पर कुछ ही दिनों में नए बाल आने शुरू हो जाते है ।
* एक चम्मच पिसा हुआ नमक व एक चम्मच कालीमिर्च को नारियल के पांच चम्मच तेल में मिलाकर गंजेपन वाले स्थान पर लगाने से शीघ्र ही बाल उगने शुरू हो जाते है ।
* कलौंजी को पीसकर उसे पानी में मिला लें। इस कलौंजी मिले पानी से सिर को कुछ दिनों तक अच्छी तरह से धोने से बाल झड़ते नहीं है और धीरे धीरे पुन: उगने लगते है।
* केले के गूदे को नीबू के रस में पीस कर लगाएं इससे भी लाभ मिलता है।
* गंजेपन के उपचार में नारियल तेल, बादाम तेल, जैतून तेल और आवँला का तेल काफी प्रभावी होता है। आप इनमें से किसी भी तेल से हर दूसरे दिन सिर की अच्छी तरह से मालिश करें। मालिश करने से पहले तेल को थोड़ा गर्म अवश्य ही कर लें जिससे सिर में तेल अच्छी तरह से समां सकें ।
* आवँला बालो के लिए बहुत ही गुणकारी माना जाता है । आँवले के गूदे और नींबू के रस को मिलाकर सिर के ऊपर अच्छी तरह लगाकर इसे रात भर के छोड़ दें फिर सुबह शैंपू से सिर धो लें।
* बालों के लिए मेथी बहुत कारगर होता है। मेथी में प्रोटीन और निकोटिनिक एसिड पाया जाता है जो बाल को बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। मेथी के बीज को रात में पानी में भिगो दें और फिर सुबह नहाने से पहले इसका पेस्ट सिर पर लगाएं। इसे सप्ताह में कम से कम 2 बार अवश्य ही करें, इससे बालो का झड़ना बंद होता है , सर पर बाल घने होते है ।
थोड़ी सी मुलहठी को दूध में पीसकर उसमें एक चुटकी केसर डाल कर उसका पेस्ट बनाये फिर इस पेस्ट को रात में सोते समय सिर पर लगाकर सो जाएँ और सुबह उठ कर इसे धो लें । ऐसा लगातार सप्ताह में 4 बार 3 माह तक करने से गंजेपन की समस्या दूर होती है।
5 चम्मच दही में एक चम्मच नींबू का रस और 2 चम्मच काले चने का पाउडर मिलाकर इसे एक घंटे तक सिर पर लगाकर रखें। फिर उसके बाद इसे धो दें। इसे सप्ताह में 2 से 3 बार करें इसके नियमित प्रयोग से सर पर जहाँ जहाँ पर बाल है वह मजबूत होते है, गंज में बाल निकलने की सम्भावना बढ़ जाती है.l
गंजापन अधिकतर पुरुषों में ज्यादा होता है । पुरुषों में आमतौर पर गंजेपन के लिए मेल हार्मोन को जिम्मेदार मानते है। शायद यही वजह है महिलाओं में गंजापन बहुत ही कम होता है। गंजापन अनुवांशिक भी होता है और पीढ़ी दर पीढ़ी भी इसका असर रहता है। यहाँ पर हम आपको कुछ घरेलू नुस्खे बता रहे है जिसके जरिए गंजेपन के असर को कम कर सकते है । और यदि आप इन उपचारो को समय रहते कर लें तो आप अपने बालों को मजबूत करके गंजेपन को रोक भी सकते हैं।
गंजेपन के कारण
गंजेपन के कई कारण हो सकते है। जैसे :----
* किसी बीमारी या किसी दवा के दुष परिणामो के कारण
* शरीर में विटामिन की कमी के कारण
* बालो को प्रतिदिन शैंपू या साबुन से धोना
* आनुवंशिक कारणों या उम्र बढ़ने के कारण
* पिट्यूटरी ग्लैंड में हार्मोन्स की कमी के कारण
* शरीर में पोषक तत्वों की कमी के कारण
* बालो की जड़ो का कमजोर हो जाने के कारण
* सर में अधिक रुसी होने कर कारण
* लगातार सर दर्द के कारण सर में रक्त संचार का सही ना होना
* गंभीर रूप से बीमार पड़ने या बुखार होने के कारण
* भावनात्मक या शारीरिक तनाव के कारण
* केमोथेरेपी या अत्यधिक विटामिन ए के कारण
* सुगंधित एवं तेज शैम्पू / तेल के दुष प्रभावों के कारण
* बालों को बहुत ज्यादा कलर या डाई करने के कारण
* दाद, एक्जिमा, और सर पर सफ़ेद दाग के कारण
* धूम्रपान के दुष प्रभावों के कारण
* प्रदूषित वातावरण, बालों का लम्बे समय तक गंदे रहने के कारण
यह सब कुछ प्रमुख कारण है जिनकी वजह से बाल तेजी से गिरते है और गंजेपन की समस्या होती है ।
गंजेपन के घरेलु उपचार
* नमक का अधिक सेवन बिलकुल भी नहीं करना चाहिए । नमक के अधिक सेवन करने से गंजापन जल्दी आ जाता है।
* अगर सर में बीच बीच में कई स्थानो से बाल गायब हो जाये, जगह जगह गंजेपन का पैच बन जाये तो उस स्थान पर दिन में 2 - 3 बार नीबू रगड़ते रहने से बाल दुबारा उगने शुरू हो जाते है ।
* उड़द की दाल उबालकर उसे पीस लें। फिर इसको सोते समय सिर पर गंजेपन में लगाये , इससे बहुत लाभ मिलता है ।
* जहां जहाँ से बाल उड़ रहे हो तो वहाँ पर प्याज का रस रगड़ते रहने से बाल पुन: आने लगते हैं।
* गंजेपन पर हरे धनिए को पीस कर उसका लेप करने से भी बाल उगने लगते हैं।
* अगर आपके परिवार में लोग गंजेपन के शिकार है अर्थात यह समस्या अनुवांशिक है तो खाने में लहसुन का अधिक से अधिक प्रयोग करें।
* नीम की पत्तियों और आंवले के चूर्ण को पानी में एक साथ डालकर उबाल लें इस पानी से सप्ताह में कम से कम दो बार सिर को धोएं ।
* अगर आपके बाल उड़ते हो तो बालों में नीम का तेल लगाइये । नीम का तेल लगाने से बालो की जड़े मजबूत होते है और उनका उड़ना / टूटना कम हो जाता है ।
* जैतून के तेल को गर्म करके उसमे एक चम्मच शहद और एक चम्मच दालचीनी पाउडर मिलाकर उसका पेस्ट बनाएं। इस पेस्ट को नहाने से पहले अपने सिर पर लगा लें। फिर 15 मिनट बाद अपने सिर को गरम पानी से धो लें । ऐसा करने पर कुछ ही दिनों में नए बाल आने शुरू हो जाते है ।
* एक चम्मच पिसा हुआ नमक व एक चम्मच कालीमिर्च को नारियल के पांच चम्मच तेल में मिलाकर गंजेपन वाले स्थान पर लगाने से शीघ्र ही बाल उगने शुरू हो जाते है ।
* कलौंजी को पीसकर उसे पानी में मिला लें। इस कलौंजी मिले पानी से सिर को कुछ दिनों तक अच्छी तरह से धोने से बाल झड़ते नहीं है और धीरे धीरे पुन: उगने लगते है।
* केले के गूदे को नीबू के रस में पीस कर लगाएं इससे भी लाभ मिलता है।
* गंजेपन के उपचार में नारियल तेल, बादाम तेल, जैतून तेल और आवँला का तेल काफी प्रभावी होता है। आप इनमें से किसी भी तेल से हर दूसरे दिन सिर की अच्छी तरह से मालिश करें। मालिश करने से पहले तेल को थोड़ा गर्म अवश्य ही कर लें जिससे सिर में तेल अच्छी तरह से समां सकें ।
* आवँला बालो के लिए बहुत ही गुणकारी माना जाता है । आँवले के गूदे और नींबू के रस को मिलाकर सिर के ऊपर अच्छी तरह लगाकर इसे रात भर के छोड़ दें फिर सुबह शैंपू से सिर धो लें।
* बालों के लिए मेथी बहुत कारगर होता है। मेथी में प्रोटीन और निकोटिनिक एसिड पाया जाता है जो बाल को बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। मेथी के बीज को रात में पानी में भिगो दें और फिर सुबह नहाने से पहले इसका पेस्ट सिर पर लगाएं। इसे सप्ताह में कम से कम 2 बार अवश्य ही करें, इससे बालो का झड़ना बंद होता है , सर पर बाल घने होते है ।
थोड़ी सी मुलहठी को दूध में पीसकर उसमें एक चुटकी केसर डाल कर उसका पेस्ट बनाये फिर इस पेस्ट को रात में सोते समय सिर पर लगाकर सो जाएँ और सुबह उठ कर इसे धो लें । ऐसा लगातार सप्ताह में 4 बार 3 माह तक करने से गंजेपन की समस्या दूर होती है।
5 चम्मच दही में एक चम्मच नींबू का रस और 2 चम्मच काले चने का पाउडर मिलाकर इसे एक घंटे तक सिर पर लगाकर रखें। फिर उसके बाद इसे धो दें। इसे सप्ताह में 2 से 3 बार करें इसके नियमित प्रयोग से सर पर जहाँ जहाँ पर बाल है वह मजबूत होते है, गंज में बाल निकलने की सम्भावना बढ़ जाती है.l
Saturday, 10 September 2016
क्षय रोग (टी.बी.) का उपचार
टी.बी. का रोग शुरू-शुरू में तो साधारण ही लगता है। मगर इसका उपचार समय पर नहीं कराया जाता है तो यह एक बड़ी बीमारी का रूप ले लेता है। इस बीमारी से ग्रस्त रोगी का शरीर धीरे-धीरे कमजोर हो जाता है क्योकि यह रोग व्यक्ति के शरीर से धातुओं और बल को खत्म कर देता है। इस बीमारी मे रोगी के शरीर में छोटे-छोटे कीटाणु पैदा हो जाते हैं जो रोगी के खांसने, थूकने, छींकने और पूरा मुंह खोलकर बोलने से दूसरे लोगों में भी जा सकता है जिससें यह रोग उन्हे भी हो सकता है। टी.बी. एक ऐसा रोग है जो सिर से लेकर पांव तक के किसी भी अंग में हो सकता है। चाहे वो दिमाग की टी.बी. हो, गले की टी.बी हो, फेफड़ों की टी.बी. हो या फिर हडि्डयों की हो। अंग्रेजी में इसका पूरा नाम ट्यूबरक्लोसिस तथा थाइसिस होता है।
टी.बी. रोग तीन अवस्थाओं में पैदा होता है।
पहली अवस्था :
टी.बी. रोग की पहली अवस्था मे पसलियों में दर्द, हाथ-पांव में अड़कन, पूरे शरीर में हल्की सी टूटन और बुखार बना रहता है। ऐसे में टी.बी. रोग का अहसास या उसका ठीक तरह से होना पता नहीं लगाया जा सकता।
दूसरी अवस्था :
टी.बी. रोग की दूसरी अवस्था में रोगी की आवाज मोटी, गैस से पेट में दर्द, कमरदर्द, बुखार, पतला पित्त आदि लक्षण प्रकट होते हैं। आरम्भ में तो इनका उपचार सहज रूप से अथवा सामान्य औषधि आदि से हो जाता है मगर किसी कारणवश रोग में वृद्धि हो जाती है, तो कठिनाई उपस्थित होती है। किसी-किसी रोगी को अन्य उपसर्गों की प्राप्ति हो जाती है, तब उन उपसर्गों के शमन का उपाय भी आवश्यक होता है।
तीसरी अवस्था :
टी.बी. रोग की तीसरी अवस्था में रोगी को तेज बुखार होता है और तेज खांसी होती है जो रोगी को बहुत ही परेशान करती है। कफ के साथ, खांसी अथवा सामान्य खांसी में भी खून आ जाने के कारण आवाज भी मोटी होती है।
कारण :
टी.बी. रोग होने का कारण जीवाणु यक्ष्मा बैसीलस (माइकोबैक्टीरियम ट्युबरकुलोसिस) होता है। यह कीटाणु उस धूल व मिट्टी में भी पायें जाते हैं जिसमें टी.बी के रोगी ने थूका हो या लार व कुल्ला किया पानी डाला हो। बीमार गाय, भैंस व बकरी के दूध को भी पीने से टी.बी. के कीटाणु व्यक्ति के शरीर में घुस जाते है। कई बार यह रोग वंशानुगत हो जाता हैं। ज्यादा वसायुक्त भोजन करना, ज्यादा मेहनत करना, धूम्रपान, शराब पीने तथा अधिक मैथुन से भी यह रोग हो जाता है। वैसे तो यह किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन बूढ़े व्यक्तियों मे इसके होने की संभावना अधिक होती है
लक्षण :
टी.बी. रोग की शुरुआत में रोगी के शरीर में कमजोरी तथा थकावट सी महसूस होती है। रोगी के कंधे, पसलियों में दर्द होता है, हाथ पैरो में जलन और बुखार बना रहता है, धीरे-धीरे मुंह सूखता जाता है। रोगी का काम करने में मन नहीं लगता है। रोगी के मुंह से थूक व लार भी ज्यादा गिरता है। बार-बार सिर दर्द और जुकाम तथा छोटी-मोटी अन्य बीमारियां शरीर में पैदा हो जाती है। रोगी की सांसे जल्दी-जल्दी चलने लगती हैं। नाड़ी की गति तेज और ढीली पड़ जाती है। कफ के साथ खून आने की शिकायत भी हो जाती है। शरीर की गर्मी कम होने लगती है और कमजोरी काफी बढ़ जाती है। ठंड़ हो या गर्मी रात को सोते समय पसीने का ज्यादा आना, दोपहर के बाद बुखार 99 से 103 डिग्री तक होना, खाना खाने में मन न लगना, खांसी के संग बलगम और खून की छींटे आना भी टी.बी. रोग के लक्षण है। शरीर कितना भी बलवान लगे अगर उसे टी.बी. है तो उसकी पसली की हड्डी नीचे जरूर घुस जाती है।
फेफड़ों की टी.बी. के लक्षण :
इसकी शुरूआत मन्द गति से होती है। कभी-कभी यह बीमारी तेजी से बढती है। इस स्थिति को विल्गत टी.बी. कहते हैं। ज्यादातर स्थितियों मे शुरू में यह सामान्य और अविशिष्ट होते हैं जिनके आधार पर रोग को पहचान पाना कठिन होता है, लेकिन जब कभी ऐसी किसी स्थिति में अकस्मात बलगम से खून आने लगता है या फेफड़ों में सूजन हो जाती है। तब इसकी पहचान आसानी से की जा सकती है।
आंतों की टी.बी. के लक्षण :-
इस रोग के लक्षण 15 या 10 दिन के अन्दर में देखे जा सकते हैं। जिसमें रोगी का मल ढीला होकर आना, पेट में कब्ज, गुड़गुड़ाहट, भोजन का पूर्ण रूप से ना पचना, कमरदर्द, सांस लेने में कठिनाई और थकावट आदि लक्षण पाये जाते हैं।
विभिन्न औषधियों से उपचार-
पेठा :
•पेठे का सेवन टी.बी. रोग में अत्यन्त लाभकारी होता है। पेठे का रस शहद में मिलाकर दिन में 3-4 बार लेना चाहियें। बाजार में बिकने वाली पेठे की मिठाई भी टी.बी. रोग के लिए लाभदायक होती है।
•पेठे का रस पीने से टी.बी. रोग से पीड़ित रोगियों के फेफड़ों की जलन में आराम होता है।
शिलाजीत : शिलाजीत टी.बी. को दूर करने में बहुत उपयोगी है। इसका सेवन शहद के साथ, दूध के साथ अथवा औषधि योगों के साथ किया जा सकता है।
अड़ूसा :
•अड़ूसा (वासा) टी.बी. रोग में बहुत लाभ करता है। अड़ूसा किसी भी रूप में नियमित सेवन करने वाले को खांसी से छुटकारा मिलता है। इसको खाने से कफ में खून नहीं आता, बुखार में भी आराम मिलता है। इसका रस और भी लाभकारी होता है। अड़ूसे के रस में शहद मिलाकर दिन में 2-3 बार लेना चाहिए।
•अड़ूसे के 3 लीटर रस में 320 ग्राम मिश्री मिलाकर धीमी आंच पर पकायें। जब यह गाढ़ा होने को हो, तब उसमें 80 ग्राम छोटी पीपल का चूर्ण मिलायें। जब यह ठीक प्रकार से चाटने योग्य पक जाये तब इसमें गाय का 160 ग्राम घी मिलाकर पर्याप्त चलायें तथा ठंड़ा होने पर उसमें 320 ग्राम शहद मिलायें। यह काढ़ा 5 ग्राम से 10 ग्राम तक टी.बी. के रोगी को दे सकते हैं। यह खांसी, सांस के रोग, कमर दर्द, हृदय का दर्द, रक्तपित्त (खूनी पित्त) और बुखार को भी दूर करता है।
गाय का पेशाब : काली स्वस्थ गाय का मूत्र प्रतिदिन 10 बार 2-2 ग्राम की मात्रा में पीने से 21 दिन में ही टी.बी. रोग मिट जाता है।
शहद : मक्खन, शहद और शक्कर को एकसाथ मिलाकर खाने से क्षय-रोग (टी.बी.) का रोगी ठीक हो जाता है।
गधी का दूध : सुबह-शाम लगभग 100-100 मिलीलीटर गधी का दूध पीने से टी.बी. रोग मिट जाता है।
कोयले की राख : यदि टी.बी. के रोगी के मुंह से खून आता हो तो आधा ग्राम पत्थर के कोयले की सफेद राख को मक्खन-मलाई या दूध के साथ खाने से खून आना बन्द हो जाता है।
आक : आक की कली पहले दिन एक निगलें, दूसरे दिन 2 तथा तीसरे दिन 3 इसके बाद प्रतिदिन 15-20 दिन तक 3-3 कली खाते रहे तो टी.बी. रोग नष्ट हो जाता है।
पीपल :
500 मिलीलीटर बकरी के दूध में 500 मिलीलीटर पानी को मिलाकर इसमें 3 पीपल डालकर उबालें। पानी जल जाने पर पीपल निकालकर खा लें। ऊपर से कम गर्म दूध पी लें। 10 दिन तक 1-1 पीपल बढ़ाकर दूध में डालें तथा ग्यारहवें दिन से 1-1 पीपल घटाते जाए। 3 पीपल पर लाकर खत्म कर बन्द कर दें। इस प्रयोग को नियमित रूप से करने से टी.बी. रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
पीपल की लाख का चूर्ण बनाकर, घी और शहद में मिलाकर रोगी को पिलाने से टी.बी का रोग ठीक हो जाता है।
टी.बी. रोग तीन अवस्थाओं में पैदा होता है।
पहली अवस्था :
टी.बी. रोग की पहली अवस्था मे पसलियों में दर्द, हाथ-पांव में अड़कन, पूरे शरीर में हल्की सी टूटन और बुखार बना रहता है। ऐसे में टी.बी. रोग का अहसास या उसका ठीक तरह से होना पता नहीं लगाया जा सकता।
दूसरी अवस्था :
टी.बी. रोग की दूसरी अवस्था में रोगी की आवाज मोटी, गैस से पेट में दर्द, कमरदर्द, बुखार, पतला पित्त आदि लक्षण प्रकट होते हैं। आरम्भ में तो इनका उपचार सहज रूप से अथवा सामान्य औषधि आदि से हो जाता है मगर किसी कारणवश रोग में वृद्धि हो जाती है, तो कठिनाई उपस्थित होती है। किसी-किसी रोगी को अन्य उपसर्गों की प्राप्ति हो जाती है, तब उन उपसर्गों के शमन का उपाय भी आवश्यक होता है।
तीसरी अवस्था :
टी.बी. रोग की तीसरी अवस्था में रोगी को तेज बुखार होता है और तेज खांसी होती है जो रोगी को बहुत ही परेशान करती है। कफ के साथ, खांसी अथवा सामान्य खांसी में भी खून आ जाने के कारण आवाज भी मोटी होती है।
कारण :
टी.बी. रोग होने का कारण जीवाणु यक्ष्मा बैसीलस (माइकोबैक्टीरियम ट्युबरकुलोसिस) होता है। यह कीटाणु उस धूल व मिट्टी में भी पायें जाते हैं जिसमें टी.बी के रोगी ने थूका हो या लार व कुल्ला किया पानी डाला हो। बीमार गाय, भैंस व बकरी के दूध को भी पीने से टी.बी. के कीटाणु व्यक्ति के शरीर में घुस जाते है। कई बार यह रोग वंशानुगत हो जाता हैं। ज्यादा वसायुक्त भोजन करना, ज्यादा मेहनत करना, धूम्रपान, शराब पीने तथा अधिक मैथुन से भी यह रोग हो जाता है। वैसे तो यह किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन बूढ़े व्यक्तियों मे इसके होने की संभावना अधिक होती है
लक्षण :
टी.बी. रोग की शुरुआत में रोगी के शरीर में कमजोरी तथा थकावट सी महसूस होती है। रोगी के कंधे, पसलियों में दर्द होता है, हाथ पैरो में जलन और बुखार बना रहता है, धीरे-धीरे मुंह सूखता जाता है। रोगी का काम करने में मन नहीं लगता है। रोगी के मुंह से थूक व लार भी ज्यादा गिरता है। बार-बार सिर दर्द और जुकाम तथा छोटी-मोटी अन्य बीमारियां शरीर में पैदा हो जाती है। रोगी की सांसे जल्दी-जल्दी चलने लगती हैं। नाड़ी की गति तेज और ढीली पड़ जाती है। कफ के साथ खून आने की शिकायत भी हो जाती है। शरीर की गर्मी कम होने लगती है और कमजोरी काफी बढ़ जाती है। ठंड़ हो या गर्मी रात को सोते समय पसीने का ज्यादा आना, दोपहर के बाद बुखार 99 से 103 डिग्री तक होना, खाना खाने में मन न लगना, खांसी के संग बलगम और खून की छींटे आना भी टी.बी. रोग के लक्षण है। शरीर कितना भी बलवान लगे अगर उसे टी.बी. है तो उसकी पसली की हड्डी नीचे जरूर घुस जाती है।
फेफड़ों की टी.बी. के लक्षण :
इसकी शुरूआत मन्द गति से होती है। कभी-कभी यह बीमारी तेजी से बढती है। इस स्थिति को विल्गत टी.बी. कहते हैं। ज्यादातर स्थितियों मे शुरू में यह सामान्य और अविशिष्ट होते हैं जिनके आधार पर रोग को पहचान पाना कठिन होता है, लेकिन जब कभी ऐसी किसी स्थिति में अकस्मात बलगम से खून आने लगता है या फेफड़ों में सूजन हो जाती है। तब इसकी पहचान आसानी से की जा सकती है।
आंतों की टी.बी. के लक्षण :-
इस रोग के लक्षण 15 या 10 दिन के अन्दर में देखे जा सकते हैं। जिसमें रोगी का मल ढीला होकर आना, पेट में कब्ज, गुड़गुड़ाहट, भोजन का पूर्ण रूप से ना पचना, कमरदर्द, सांस लेने में कठिनाई और थकावट आदि लक्षण पाये जाते हैं।
विभिन्न औषधियों से उपचार-
पेठा :
•पेठे का सेवन टी.बी. रोग में अत्यन्त लाभकारी होता है। पेठे का रस शहद में मिलाकर दिन में 3-4 बार लेना चाहियें। बाजार में बिकने वाली पेठे की मिठाई भी टी.बी. रोग के लिए लाभदायक होती है।
•पेठे का रस पीने से टी.बी. रोग से पीड़ित रोगियों के फेफड़ों की जलन में आराम होता है।
शिलाजीत : शिलाजीत टी.बी. को दूर करने में बहुत उपयोगी है। इसका सेवन शहद के साथ, दूध के साथ अथवा औषधि योगों के साथ किया जा सकता है।
अड़ूसा :
•अड़ूसा (वासा) टी.बी. रोग में बहुत लाभ करता है। अड़ूसा किसी भी रूप में नियमित सेवन करने वाले को खांसी से छुटकारा मिलता है। इसको खाने से कफ में खून नहीं आता, बुखार में भी आराम मिलता है। इसका रस और भी लाभकारी होता है। अड़ूसे के रस में शहद मिलाकर दिन में 2-3 बार लेना चाहिए।
•अड़ूसे के 3 लीटर रस में 320 ग्राम मिश्री मिलाकर धीमी आंच पर पकायें। जब यह गाढ़ा होने को हो, तब उसमें 80 ग्राम छोटी पीपल का चूर्ण मिलायें। जब यह ठीक प्रकार से चाटने योग्य पक जाये तब इसमें गाय का 160 ग्राम घी मिलाकर पर्याप्त चलायें तथा ठंड़ा होने पर उसमें 320 ग्राम शहद मिलायें। यह काढ़ा 5 ग्राम से 10 ग्राम तक टी.बी. के रोगी को दे सकते हैं। यह खांसी, सांस के रोग, कमर दर्द, हृदय का दर्द, रक्तपित्त (खूनी पित्त) और बुखार को भी दूर करता है।
गाय का पेशाब : काली स्वस्थ गाय का मूत्र प्रतिदिन 10 बार 2-2 ग्राम की मात्रा में पीने से 21 दिन में ही टी.बी. रोग मिट जाता है।
शहद : मक्खन, शहद और शक्कर को एकसाथ मिलाकर खाने से क्षय-रोग (टी.बी.) का रोगी ठीक हो जाता है।
गधी का दूध : सुबह-शाम लगभग 100-100 मिलीलीटर गधी का दूध पीने से टी.बी. रोग मिट जाता है।
कोयले की राख : यदि टी.बी. के रोगी के मुंह से खून आता हो तो आधा ग्राम पत्थर के कोयले की सफेद राख को मक्खन-मलाई या दूध के साथ खाने से खून आना बन्द हो जाता है।
आक : आक की कली पहले दिन एक निगलें, दूसरे दिन 2 तथा तीसरे दिन 3 इसके बाद प्रतिदिन 15-20 दिन तक 3-3 कली खाते रहे तो टी.बी. रोग नष्ट हो जाता है।
पीपल :
500 मिलीलीटर बकरी के दूध में 500 मिलीलीटर पानी को मिलाकर इसमें 3 पीपल डालकर उबालें। पानी जल जाने पर पीपल निकालकर खा लें। ऊपर से कम गर्म दूध पी लें। 10 दिन तक 1-1 पीपल बढ़ाकर दूध में डालें तथा ग्यारहवें दिन से 1-1 पीपल घटाते जाए। 3 पीपल पर लाकर खत्म कर बन्द कर दें। इस प्रयोग को नियमित रूप से करने से टी.बी. रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
पीपल की लाख का चूर्ण बनाकर, घी और शहद में मिलाकर रोगी को पिलाने से टी.बी का रोग ठीक हो जाता है।
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